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नंदा देवी लोक जात यात्रा 31 अगस्त से, जानिए कब होगा समापन

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गोपेश्वर :- इस वर्ष नंदा देवी लोक जात यात्रा का आगाज 31अगस्त से होगा। प्रति वर्ष भाद्र मास के नंदा पक्ष में निकलने वाली बधाण पट्टी की अराध्या नंदा देवी की लोक जात का आयोजन किया जाता है। यात्रा का समापन 20 सितंबर को होगा।

मंदिर समिति एवं आयोजन कमेटी कुरूड़, देवराड़ा के तय कार्यक्रम के अनुसार 31 अगस्त को देवी यात्रा कुरूड़ सिद्धपीठ से शुरू होगी। उस दिन यात्रा रात्रि विश्राम के लिए चरबंग पहुंचेगी। अगले दिन एक सितम्बर को यात्रा चरबंग से कुंडबगड़ होते हुए रात्रि प्रवास के लिए मथकोट पहुंचेगी। दो तारीख को मथकोट से धरगांव, घाट होते हुए रात्रि विश्राम के लिए उस्तोली, तीन तारीख को उस्तोली से लांखी होते हुए भेटी, चार तारीख को भेटी से स्यारी बंगाली होते हुए रात्रि विश्राम के लिए थराली ब्लाक के बूंगा गांव पहुंचेगी। पांच तारीख को बूंगा से सोलडुंग्री, छह तारीख को सोलडुंग्री से केरा, मैन होते हुए सूना, सात तारीख को सूना से थराली नगर क्षेत्र होते हुए चेपड़ो, आठ तारीख को चेपड़ो से कोठी ,धरातल्ला धरामल्ला होते हुए बेराधार, नौ तारीख को बेराधार से इच्छोली होते हुए फल्दियागांव, 10 तारीख को फल्दियागांव से कांडे, पिलखड़ा, ल्वाणी, हरनी होते हुए मुंदोली, 11 तारीख को मंदोली से लोहाजंग, कुलिंग होते हुए रात्रि विश्राम के लिए लाटूधाम वांण पहुंचेगी।

12 सितंबर को वांण से लाटूधाम के मंदिर, रणकाधार होते हुए निर्जन पड़ाव गैरोली पातल पहुंचेगी। 13 तारीख को गैरोली पातल से प्रातः काल वेदनी बुग्याल जहां पर नंदा देवी की जात (नंदा देवी की विशेष पूजा-अर्चना) पितरों को तर्पण सहित अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के साथ एक तरह से यात्रा का समापन होगा। इसके बाद यात्रा वापस देवराड़ा के लिए आ जाएगी। 14 तारीख को यात्रा बांक से लोहाजंग, बगड़ीगाड़ होते ल्वाणी पहुंचेगी, 15 तारीख को ल्वाणी से कांडे, बमणबेरा होते हुए उलंग्रा, 16 तारीख को उलंग्रा हाटकल्याणी, देवाल होते हुए पूर्णा 17 तारीख को पूर्णा से चिड़िगा होते हुए जौला 18 तारीख को जौला से त्रिकोट, सेरा होते हुए बिजेपुर, 19 तारीख को बिजेपुर से तलवाड़ी होते हुए रात्रि विश्राम के लिए बैनोली गांव पहुंचेगी। 20 सितंबर को यात्रा बैनोली से लोल्टी, तुंगेश्वर होते हुए सिद्धपीठ देवराड़ी पहुंचेगी जहां पर पूरे विधि-विधान के साथ नंदादेवी के उत्सव डोली को मंदिर के गर्भगृह में विराजमान किया जाएगा और यहीं पर अगले छह माह तक डोली की पूजा-अर्चना की जाएगी।