जब भी मानव सभ्यता ने आसमान की ओर देखा है, उसने सितारों के साथ अपने जीवन के लिए संभावनाओं के अनंत विस्तार को देखा है। आज उसी विस्तार में भारत अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है। कभी सीमित संसाधनों के साथ शुरुआत करने वाला भारत वर्तमान में वह देश है जोकि वैश्विक अंतरिक्ष मानचित्र पर भरोसे का पर्याय बन चुका है। यह भरोसा सफल प्रक्षेपणों, वैज्ञानिक उपलब्धियों का परिणाम तो है ही, साथ ही एक व्यापक दृष्टि, नीति-सुधारों, निजी भागीदारी और युवा प्रतिभाओं के संगम से निर्मित हुआ है।
केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह का यह वक्तव्य इस दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को और स्पष्ट करता है। उन्होंने बताया है कि कैसे भारत में निजी क्षेत्र का अंतरिक्ष निवेश पिछले पाँच वर्षों में 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो चुका है। यह आंकड़ा वास्तव में कोई साधारण या सामान्य नहीं है, जिसमे देश की आर्थिक वृद्धि के तमाम अवसर समाहित हैं।
अब भारत सरकार ने अंतरिक्ष से जुड़े विषयों को वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक सीमित न रखते हुए इसे विश्वविद्यालयों और कॉलेजों तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। पहले चरण में सात अंतरिक्ष प्रयोगशालाओं की स्थापना की योजना बनाई गई है, जहां छात्र उपग्रह प्रणाली, रॉकेटरी और मिशन डिजाइन का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करेंगे। यह पहल भारत के अंतरिक्ष भविष्य की नींव को मजबूत करेगी। जब छात्र अपने कॉलेज परिसर में ही उपग्रह डिजाइन करेंगे या मिशन प्लानिंग सीखेंगे, तब वे भविष्य के मिशनों का निर्माण भी करेंगे।
इस संदर्भ में IN-SPACe के अध्यक्ष डॉ. पवन गोयनका ने भारत के अंतरिक्ष सुधारों की प्रगति पर प्रकाश डालते हुए बताया भी है कि कैसे निजी क्षेत्र अब मूल्य श्रृंखला के हर हिस्से में सक्रिय भूमिका निभा रहा है और भारत का निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र पिछले कुछ वर्षों में आश्चर्यजनक गति से विकसित हुआ है। 2019 में जहां अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की संख्या एकल अंक में थी, वहीं 2026 की शुरुआत तक यह संख्या 400 से अधिक हो चुकी है।
ये स्टार्टअप्स प्रक्षेपण यान, उपग्रह निर्माण, पेलोड डेवलपमेंट, ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेवाओं जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सक्रिय हैं। इसके अलावा, इन-ऑर्बिट सेवाएं जैसे सैटेलाइट सर्विसिंग और स्पेस डेटा एनालिटिक्स जैसे उभरते क्षेत्रों में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह बदलाव आज इस बात का प्रतीक भी है कि केंद्र की मोदी सरकार के प्रोत्साहन स्वरूप पहले अंतरिक्ष कार्यक्रम सिर्फ सरकारी संस्थानों तक सीमित रहते थे, जबकि आज के समय में यह उद्यमिता और नवाचार का नया क्षेत्र बन चुका है।
सरकार ने इस तेजी को बनाए रखने के लिए कई लक्षित पहलें शुरू की हैं, जिसमें कि 1,000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल फंड (एसआईडीबीआई के सहयोग से), 500 करोड़ रुपये का टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड, सीड फंड योजना के तहत 1 करोड़ रुपये तक का अनुदान को प्रमुखता से बताया जा सकता है। इन योजनाओं का उद्देश्य वित्तीय सहायता के साथ विचारों को वास्तविक उत्पादों में बदलना है। यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि कोई भी अच्छा विचार संसाधनों की कमी के कारण पीछे न रह जाए।
वस्तुत: इससे जुड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता अकेली तकनीक आधारित नहीं होती है, इसके लिए उच्च स्तर का मानव प्रशिक्षण अति आवश्यक है। अच्छा यह है कि पिछले कुछ सालों में इस दिशा में भारत ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। गहारायी से विचार करें तो अब तक 17 विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरे किए जा चुके हैं, जिनमें लगभग 900 प्रतिभागियों को उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण प्रणाली और अंतरिक्ष साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में प्रमाणित किया गया है। यह पहल आज स्पष्ट कर रही है कि भारत अपने मिशन लॉन्च तो कर ही रहा है, साथ में एक संपूर्ण अंतरिक्ष इकोसिस्टम तैयार कर रहा है।
यही कारण है जो भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब वैश्विक सहयोग का केंद्र बन चुका है। वर्तमान में भारत की साझेदारी 45 से अधिक देशों तक फैल चुकी है। जैसा कि हमने देखा भी कि हाल के वर्षों में सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ समझौते, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय कंपनियों की सक्रिय भागीदारी और घरेलू स्टार्टअप्स को वैश्विक बाजारों से जोड़ने की पहल इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
भारत की अंतरिक्ष सफलता की कहानी में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की भूमिका केंद्रीय रही है। चंद्रयान, मंगलयान और सैकड़ों सफल उपग्रह प्रक्षेपणों ने भारत को एक विश्वसनीय अंतरिक्ष शक्ति के रूप में स्थापित किया है। डॉ. विक्रम साराभाई का यह दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक है कि “हम अंतरिक्ष तकनीक को सिर्फ प्रतिष्ठा के लिए नहीं पाना चाहते हैं, भारत का उद्देश्य पूरी तरह से स्पष्ट और सार्वजनिक है कि समाज के विकास के लिए हमें अंतरिक्ष तकनीक का उपयोग करते रहना हैं।” आज हम देखते भी हैं कि भारत के वैज्ञानिकों एवं केंद्र सरकार ने इसी सोच के साथ अंतरिक्ष को शिक्षा, कृषि, मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन और संचार जैसे क्षेत्रों में उपयोग किया है।
इसके साथ एक बात यह भी दिखाई देती है कि वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आकार 500 बिलियन डॉलर से अधिक है, भारत का लक्ष्य इसमें अपनी हिस्सेदारी को तेजी से बढ़ाना है ।फिलहाल देखने में आ रहा है कि निजी निवेश और स्टार्टअप्स इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यही कारण है जोकि अंतरिक्ष तकनीक अब राष्ट्रीय सुरक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी और डेटा इकोनॉमी का भी आधार बन चुकी हैं। ऐसे में कहना यही है कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा विश्वास, दृष्टि और सामूहिक प्रयास का ही आज सुखद परिणाम के रूप में हमारे सामने है। निश्चित ही जब विश्व भारत की ओर देखता है, तब अच्छा लगता है कि एक भरोसेमंद साझेदार, एक नवाचारी शक्ति और एक प्रेरणास्रोत के रूप में भारत हमें दिखाई देता है।