हाईकोर्ट ने हिरासत में मौत मामले को सिर्फ पुलिस के बयान पर बंद करने को लेकर एनएचआरसी को फटकारा

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प्रयागराज, 20 मई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक दिव्यांग व्यक्ति की हिरासत में हुई मौत के 16 साल पुराने मामले में गंभीर ‘संस्थागत विफलताओं’ को उजागर करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) और यूपी पुलिस को फटकार लगाई। कोर्ट ने मामले की सच्चाई सामने लाने में हाईकोर्ट की अपनी प्रक्रियागत देरी को भी स्वीकार किया। अपने आदेश में कोर्ट ने मानवाधिकार आयोग की कड़ी आलोचना की कि उसने बिना किसी स्वतंत्र जांच के, पुलिस के बयान को ही अंतिम सत्य मानकर 2009 के इस मामले को बंद कर दिया।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने टिप्पणी की ‘राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी तरफ़ से स्वतंत्र जांच के नाम पर कुछ भी नहीं किया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस तरह से आयोग ने इस मामले की जांच की, वह बेहद निराशाजनक है। अगर आयोग को बस इतना ही करना था और हिरासत में हुई मौत का मामला पूरी तरह से पुलिस के बयान के आधार पर बंद कर देना था-जो इस मामले में एक पक्षकार है, और मृतक के परिवार के निष्पक्ष गवाहों से कोई स्वतंत्र सबूत नहीं जुटाने थे, तो यह आयोग के अस्तित्व पर ही सवाल उठाता है।’

हालांकि, कोर्ट ने आयोग के वकील की दलीलें सुनने के बाद आयोग के आचरण पर अपने अंतिम निष्कर्ष सुरक्षित रख लिया। कोर्ट एनजीओ ‘एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव्स’ (एएएलआई), लखनऊ द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका 2009 में दन्नाहार पुलिस स्टेशन (मैनपुरी ज़िला) के लॉकअप के अंदर, 40 प्रतिशत शारीरिक दिव्यांगता वाले एक व्यक्ति, नाहर सिंह की मौत से सम्बंधित थी। जहां पुलिस ने दावा किया कि उसने अपनी चमड़े की बेल्ट का इस्तेमाल करके (लॉकअप के शौचालय वाले हिस्से में) खुद को फांसी लगा ली थी। वहीं कोर्ट ने पाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बेल्ट के बकल के निशान के बजाय ‘गांठ का निशान’ मिला था। इसके साथ ही श्वास नली की हड्डियां भी टूटी हुई मिली थीं। खंडपीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ये निशान फांसी लगाने के बजाय गला घोंटने के मामले में ज्यादा संभावित होते हैं।

खंडपीठ ने कहा कि इस बात से एक उचित संदेह पैदा होता है कि मृतक का पहले पुलिस स्टेशन के अंदर ही गला घोंटा गया था। फिर हिरासत में हुई मौत या हत्या के आरोपों से बचने के लिए पुलिसकर्मियों द्वारा उसके शव को लटका दिया गया। हालांकि, बेंच इस बात से विशेष रूप से नाराज़ थी कि घटना स्थल और पोस्टमॉर्टम की वीडियोग्राफी और तस्वीरें पिछले 16 सालों से कोर्ट को उपलब्ध नहीं कराई जा रही थीं, ताकि कोर्ट आगे की कार्रवाई कर सके।

मानवाधिकार आयोग के अलावा, बेंच ने इस मामले में सच्चाई का पता लगाने में हाईकोर्ट और राज्य पुलिस की पूरी तरह से विफलता पर भी आपत्ति जताई। अपनी भूमिका के बारे में बेंच ने कहा कि कोर्ट को 3 महीने के भीतर इस मामले को निपटा देना चाहिए था। वीडियोग्राफी पेश करने के लिए राज्य पर लगातार दबाव बनाना चाहिए था। बेंच ने टिप्पणी की, ‘परेशान करने वाली बात यह है कि सच्चाई का पता लगाने की इस कोशिश में सबसे पहले जो संस्था विफल रही, वह यह कोर्ट ही है। जनहित याचिका का विषय ऐसा था कि इसमें तुरंत कार्रवाई और सबूतों को सुरक्षित रखने तथा उन्हें इस कोर्ट के सामने पेश करने के लिए बार-बार सुनवाई की ज़रूरत थी ताकि कोर्ट इस बात से संतुष्ट हो सके कि राज्य का यह दावा कि नाहर सिंह ने लॉक-अप के टॉयलेट में आत्महत्या कर ली थी, सच था, और उस कहानी का कोई दूसरा पहलू नहीं था।’

बेंच ने आगे कहा कि इस मामले में 16 साल की प्रक्रियागत देरी ने पुलिस और राज्य को अपने ‘गलत कामों पर पर्दा डालने’ का ऐसा मौका दे दिया है कि सच्चाई छिपी ही रह गई। बेंच ने आगे कहा, इस देरी के कारण अब वीडियोग्राफी वाले सबूतों को हासिल करने की इस कोर्ट की कोशिशें भी नाकाम होती दिख रही हैं। इस मामले में पुलिस की भूमिका के बारे में बेंच ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट के सामने वीडियोग्राफी पेश करने की उनकी अनिच्छा शायद किसी अपराध को छिपाने के लिए थी। बेंच ने पाया कि राज्य के साथ बार-बार हुई बातचीत के दौरान, पुलिस-राज्य कोर्ट को यह समझाने में असमर्थ रहे कि क्या वे वीडियो रिकॉर्डिंग कभी पुलिस के कब्ज़े से बाहर भी गईं, जबकि पुलिस का दावा था कि सबूत मानवाधिकार आयोग को भेज दिए गए।

जब लापता वीडियो सबूतों को हासिल करने की बार-बार की कोशिशें नाकाम रहीं तो हाईकोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह 60 दिनों के भीतर लापता वीडियो सबूतों को हासिल करे। हालांकि, सीबीआई से कहा गया कि वह इस चरण में एफआईआर दर्ज न करे और केवल वीडियो को कोर्ट के सामने पेश करे। इस मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को होगी।