युगों से चली आ रही मिट्टी से बर्तन बनाने की कला : हरिराम

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कानपुर,03 जून(हि.स.)। युगों से चली आ रही इस खूबसूरत माटी कला को हम सहेजना चाहते हैं। प्लास्टिक और मशीन से बने उत्पादों के आने से मिट्टी के बर्तनों से जुड़ी गतिविधियां कम हो गई हैं। यह बात शनिवार को कानपुर आईआईटी आयोजित कुम्हारों प्रशिक्षण कार्यशाला को संबोधित करते हुए राज्य पुरस्कार विजेता हरि राम ने कही।

उन्होंने कहा कि नया उत्पाद जो बाजार की मांग से मेल खाता है, दस्तकारी मिट्टी के बर्तनों को बचा सकता है। नये ढंग एवं कलात्मक ढंग से तैयार किए गए मिट्टी के बर्तन की मांग बढ़ी है। इसका प्रचार-प्रसार भी योगी सरकार ने काफी किया।

मटेरियल साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर कल्लोल मंडल ने सरफेस फिनिश में कास्टिंग और इनोवेशन के टिप्स दिए। डिजाइन विभाग के प्रोफेसर सत्यकी रॉय ने उच्च गुणवत्ता वाली फिनिश हासिल करने और विशिष्ट बाजारों की खोज के बारे में बात की।

आरएसके में गतिविधियों का समन्वय कर रही रीता सिंह ने बताया कि यह केंद्र बिठूर और उसके आसपास के गांवों के 100 से अधिक कुम्हारों से जुड़ा है। इस 5 दिवसीय कार्यशाला का उद्देश्य 10 चयनित कुम्हारों के साथ काम कर उन्हें कौशल और ज्ञान देना था। धीरे-धीरे उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार होगा और बाजार में उनकी अपील बेहतर होगी।

प्रशिक्षण के दौरान कुम्हारों ने न केवल मिट्टी के बर्तन बनाने के नए तरीके सीखें, बल्कि आईआईटी कानपुर की ढलाई प्रयोगशाला, कानपुर विश्वविद्यालय की मिट्टी के बर्तन बनाने की प्रयोगशाला और लता क्रिएशन (मिट्टी के बर्तन बनाने का कारखाना) का दौरा भी किया। अंत में प्रतिभागियों ने अपने उत्पादों का प्रदर्शन किया और उन्हें प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।

प्रशिक्षण में पचौर, मंधना, नारामऊ, बैकुंठपुर, लक्ष्मीपुर और तात्या टोपे नगर से युवा कुम्हार आए थे। इसके अतिरिक्त जिला उद्योग केंद्र के महाप्रबंधक एसएल यादव तैयार उत्पादों की सराहना की और विभिन्न योजनाओं के बारे में बताया जिसका लाभ कुम्हार अपने व्यवसाय के विस्तार के लिए उठा सकते हैं। प्रोफेसर संदीप सांगल और प्रोफेसर सुधांशु शेखर सिंह, प्रोफेसर शतरूपा रॉय भी मौजूद थे।

उल्लेखनीय है कि उन्नत भारत अभियान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर ने रणजीत सिंह रोज़ी शिक्षा केंद्र में मिट्टी के बर्तन बनाने की कार्यशाला का आयोजन किया। माटी कला नामक कार्यशाला का उद्देश्य मिट्टी के बर्तन बनाने के नए तरीकों के साथ बिठूर के कुम्हारों को तैयार करना है।