कानपुर, 06 जून (हि.स.)। फसलों को कीट एवं खरपतवारों से बचाने के लिए रसायनों का प्रयोग किया जाता है। इससे जब फसल का भूसा बनता है और नया भूसा खाने से पशुओं को परेशानी हो सकती है। नया भूसा खाने से पशुओं का पाचन तंत्र खराब हो जाता है और पशु पतला गोबर करने लगता है। यह बातें सोमवार को सीएसए के पशुपालन वैज्ञानिक डॉ शशिकांत ने कही।
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) के अधीन संचालित कृषि विज्ञान केंद्र दलीप नगर के पशुपालन वैज्ञानिक डॉ शशिकांत ने बताया कि रसायन फैट के साथ घुलमिल जाते हैं। कभी-कभी पशु के अंदर इन रसायनों की मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि वह लिपोफिलिक होने के कारण पशु के दूध में उपस्थित फैट के साथ मिलकर दूध तक में स्रावित होने लगते हैं। मानव द्वारा दूध पीने पर उसके शरीर में पहुंच जाता है और उसे नुकसान करता है।
उन्होंने बताया कि शोधों द्वारा ज्ञात हुआ है कि 1 किलो भूसे में 1.1 से 1.2 मिलीग्राम तक रसायन पाया गया है। इसके कारण बड़े पशुओं का गोबर पतला हो जाता है छोटे पशुओं को दस्त लग सकते हैं। दुधारू पशुओं का दूध घट सकता है और उसकी प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है तथा मादा पशुओं के हीट में न आने की समस्या आ सकती है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में तैयार भूसे में लैक्टिक एसिड की मात्रा अधिक होती है जिससे नया चारा खाने वाले पशु अफरा रोग के शिकार हो सकते हैं। उन्होंने पशुपालकों को सलाह दी है कि रसायनों की जगह बायोपेस्टिसाइड का ही उपयोग करें। नए भूसे को तुरंत ही पशुओं को खिलाना शुरू न करें बल्कि कम से कम 2 महीने बाद ही पशुओं को खाने को दें ताकि रसायन अक्रिय हो जाएं।
उन्होंने सलाह दी कि नया भूसा खिलाना मजबूरी है तो भूसे को रात भर भिगो लेने के बाद खिलाए। पशुपालक भाई कुछ दिनों तक नए व पुराने चारे को मिलाकर खिलाने की आदत डालें। पशुपालकों को सलाह दी है कि पशु गर्मी की चपेट में न आए इसके लिए दिन में लगभग पांच बार पानी पिलाएं और ज्यादा समय तक पशुओं को धूप में न छोड़े।