जनसांख्यिकी तय करेगी विकसित भारत की दिशा, अखंड भारत की चेतना बनेगी आधार : रविन्द्र सिंघवी

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लखनऊ, 09 अक्टूबर । राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता, उसकी शक्ति जनसंख्या, संस्कृति, परिवार, अर्थव्यवस्था, सामाजिक चेतना और आने वाली पीढ़ियों में भी निहित होती है। अखंड भारत की ऐतिहासिक स्मृति से विकसित भारत के भविष्य तक की यात्रा केवल भूगोल का विषय नहीं, बल्कि बदलती जनसांख्यिकी, विभाजन की स्मृतियों, सांस्कृतिक निरंतरता और राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़े विमर्श का भी हिस्सा है। इसी व्यापक संदर्भ में फिल्म निर्माता रविन्द्र सिंघवी ने एक लघु फिल्म बनाई है। फिल्म में जनसंख्या, जनगणना, विवाह, सामाजिक संरचना, विभाजन, प्रवासन, नागरिकता और राष्ट्रीय संप्रभुता जैसे विषयों पर विमर्श किया गया है।

1881 से 2011 तक की जनगणनाओं के संदर्भ में फिल्म निर्माता रविन्द्र सिंघवी ने भारत की बदलती जनसांख्यिकीय तस्वीर पर सवाल उठाए हैं। फिल्म में 1941 के विभाजन-पूर्व आंकड़ों, 1951 के स्वतंत्र भारत और 2011 की आखिरी पूर्ण जनगणना के संदर्भ में जनसंख्या में आए बदलावों को समझने का प्रयास किया गया है। सिंघवी के अनुसार, जनसंख्या के अनुपात में परिवर्तन को केवल आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों पर भी विमर्श होना चाहिए। सिंघवी ने कहा कि जनसंख्या का प्रश्न परिवार और विवाह से भी जुड़ा है। भारतीय परंपरा में विवाह को सामाजिक निरंतरता और पारिवारिक उत्तरदायित्व से जोड़ा गया है। हालांकि आधुनिक भारत में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिलाओं की शिक्षा, करियर, आर्थिक आत्मनिर्भरता और मातृत्व के अधिकार को भी समान महत्व दिया जाना जरूरी है। विवाह या मातृत्व किसी व्यक्ति पर थोपा नहीं जा सकता, लेकिन समाज की अगली पीढ़ी और मानव संसाधन निर्माण को लेकर भी विचार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बड़ी युवा आबादी शिक्षित, कुशल और रोजगारयुक्त हो तो वह भारत की आर्थिक शक्ति बन सकती है। वहीं शिक्षा, रोजगार और संसाधनों की कमी होने पर यही जनसंख्या चुनौती का रूप ले सकती है। इसलिए जनसंख्या नीति को केवल जन्मदर की चर्चा तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि इसे मानव संसाधन निर्माण से भी जोड़कर देखना होगा। फिल्म में भारत-विभाजन को जनसांख्यिकी और राजनीति के ऐतिहासिक संबंध के संदर्भ में भी रखा गया है। 1947 का भारत-विभाजन, पाकिस्तान का गठन, 1971 में बांग्लादेश का निर्माण और विस्थापित परिवारों की पीड़ा भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण स्मृतियों का हिस्सा हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अन्य क्षेत्रों से भारत आए लोगों की नागरिकता और पहचान का प्रश्न भी इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है। इसी संदर्भ में नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 को भी फिल्म में चर्चा के विषय के रूप में रखा गया है।