शोधार्थियों के शोध और आर्थिक उन्नति में बौद्धिक संपदा अधिकार महत्वपूर्ण: प्रो. तिवारी

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नैनीताल, 12 अक्टूबर । कुमाऊं विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष एवं विजिटिंग प्रोफेसर निदेशालय के निदेशक प्रो. ललित तिवारी ने सोमवार को समाजशास्त्र विभाग में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के प्रायोजन में आयोजित दस दिवसीय शोध पद्धति कार्यशाला को तृतीय दिवस संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनकी जानकारी शोध को बेहतर बनाने के साथ ही शोधार्थियों की आर्थिक उन्नति में भी सहायक है।

प्रो. तिवारी ने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार आविष्कारों के सृजन और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि संसार में ऐसी कोई समस्या नहीं है, जो मनुष्य के मन की शक्ति से अधिक शक्तिशाली हो। मानव मस्तिष्क की क्षमताएं समस्या समाधान और रचनात्मकता को बढ़ावा देती हैं। इससे देश में शोध एवं विकास की दर बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

उन्होंने बौद्धिक संपदा अधिकारों के विभिन्न प्रकारों की जानकारी देते हुए कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, पेटेंट, औद्योगिक डिजाइन, भौगोलिक संकेतक, लेआउट डिजाइन, व्यापार रहस्य तथा पादप किस्मों के संरक्षण के बारे में बताया। उन्होंने उत्तराखंड को 4 दिसंबर 2024 को मिले भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग का उल्लेख करते हुए लाल चावल और दन जैसे उत्पादों की जानकारी भी दी।

प्रो. तिवारी ने बताया कि व्यापार-संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकारों (ट्रिप्स) के समझौते के बाद एक जनवरी 1995 से इससे संबंधित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था लागू हुई। इसका उद्देश्य रचनात्मक कार्यों को संरक्षण देना, नवाचार को प्रोत्साहित करना और आर्थिक विकास में योगदान बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकारों की जानकारी शोध में उद्यमिता को बढ़ावा देने में भी सहायक है।