क्या हम अपने किशोरों को समझ पा रहे हैं, एक सवाल जो पूरे समाज से है

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भोपाल में 17 वर्षीय बेटी ओजस्वी द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटना ने सभी को झकझोर दिया है। एक होनहार बच्ची, एक संवेदनशील बेटी, जिसने अपने अंतिम शब्दों में सिर्फ इतना लिखा- “सॉरी मम्मी-पापा, मैं अच्छी बेटी नहीं बन सकी…”। अब इसे हम क्या कहें? वास्तव में यह एक परिवार का दुख नहीं है, यह तो आधुनिक समाज की उस विफलता का प्रतीक है, जहां बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने से पहले ही भीतर टूटने लगते हैं।

आज हर माता-पिता अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का सपना देखता है, किंतु इस दौड़ में हम यह भूल जाते हैं कि बच्चों का मन भी होता है, उनकी भावनाएं भी होती हैं और उनकी सहन करने की क्षमता भी सीमित होती है। भोपाल की यह घटना हमें चेतावनी देती है कि यदि समय रहते बच्चों की मानसिक स्थिति को नहीं समझा गया, तो हम प्रतिभाशाली पीढ़ी को खोते रहेंगे।

किशोरावस्था है भावनात्मक संघर्ष का कठिन दौर

जीवन का सबसे संवेदनशील समय 13 से 19 वर्ष की आयु माना जाता है। यही वह अवस्था है जब बच्चे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक परिवर्तनों से गुजरते हैं। वे स्वयं को पहचानने की कोशिश करते हैं, अपनी जगह तलाशते हैं और लगातार तुलना के दबाव में रहते हैं। नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन के अध्ययन के अनुसार भारत में 13 से 17 वर्ष की आयु के हर चार में से एक बच्चा डिप्रेशन की समस्या से जूझ रहा है। यह आंकड़ा देखा जाए तो उन लाखों बच्चों की खामोश पीड़ा है जो अंदर ही अंदर टूट रहे हैं।

आज का बच्चा बचपन से ही प्रतियोगिता में धकेल दिया जाता है। स्कूल में अच्छे अंक, कोचिंग का दबाव, प्रतियोगी परीक्षाएं, करियर की चिंता और दूसरों से बेहतर बनने की होड़ बच्चों को मानसिक रूप से थका रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में छात्र आत्महत्या के मामलों में लगभग 65 प्रतिशत वृद्धि हुई है। वर्ष 2013 में जहां 8423 छात्रों ने आत्महत्या की थी, वहीं 2023 में यह संख्या बढ़कर 13,892 हो गई। यह आंकड़ा बताता है कि शिक्षा का दबाव अब प्रेरणा न होकर भय का कारण बनता जा रहा है।

Sapien Labs की ग्लोबल माइंड हेल्थ रिपोर्ट 22025 के अनुसार भारत के युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य लगातार कमजोर हो रहा है। 18 से 34 वर्ष के युवाओं का Mind Health Quotient काफी कम पाया गया। इसका अर्थ है कि नई पीढ़ी तनाव, भावनाओं और रिश्तों को संभालने में संघर्ष कर रही है।

डांट से अधिक संवाद है जरूरी

बच्चों को अनुशासन सिखाना आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है उनके मन को समझना। कई बार माता-पिता अनजाने में बच्चों पर अत्यधिक अपेक्षाओं का बोझ डाल देते हैं। वे चाहते हैं कि बच्चा हर क्षेत्र में श्रेष्ठ हो, लेकिन यह नहीं समझते कि बच्चे भी थकते हैं, डरते हैं और टूटते हैं।उन्हें यह महसूस होना चाहिए कि असफल होने पर भी परिवार उनका साथ देगा। यदि बच्चा उदास है, चुप रहने लगा है, गुस्सा करने लगा है या अकेले रहना पसंद करने लगा है, तो यह सिर्फ “जिद” नहीं हो सकती, बल्कि मानसिक तनाव का संकेत भी हो सकता है।

दूसरी ओर दुर्भाग्य से अधिकांश स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य को अभी भी गंभीरता से नहीं लिया जाता। स्कूलों में नियमित काउंसलिंग, भावनात्मक शिक्षा, तनाव प्रबंधन और जीवन कौशल प्रशिक्षण की आवश्यकता है। शिक्षकों को यह प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि वे बच्चों में अवसाद, चिंता और आत्मघाती संकेतों को पहचान सकें। कई बच्चे घर की बजाय स्कूल में अपने मन की बात कहना अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं, इसलिए शिक्षक विषय पढ़ाने के साथ ही संवेदनशील मार्गदर्शक भी होने चाहिए।

समाज की संवेदनहीनता भी जिम्मेदार

आज समाज बच्चों की उपलब्धियों की चर्चा तो करता है, लेकिन उनकी परेशानियों को अक्सर नजरअंदाज कर देता है। यदि कोई बच्चा मानसिक तनाव की बात करे, तो उसे “कमजोर”, “नालायक” या “ओवरसेंसिटिव” कह दिया जाता है। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर फैला कलंक बच्चों को मदद मांगने से रोकता है। उन्हें डर होता है कि लोग उनका मजाक उड़ाएंगे या उन्हें असफल समझेंगे। यही चुप्पी कई बार घातक बन जाती है। वास्तव में हमें यह समझना होगा कि मानसिक बीमारी भी उतनी ही वास्तविक है जितनी शारीरिक बीमारी। जैसे बुखार होने पर इलाज जरूरी होता है, वैसे ही अवसाद और चिंता की स्थिति में भावनात्मक सहायता और विशेषज्ञ परामर्श जरूरी है।

बच्चों को क्या चाहिए?

बच्चों को महंगे मोबाइल, बड़े स्कूल या केवल सुविधाएं नहीं चाहिएं। उन्हें चाहिए- समय, विश्वास, अपनापन और बिना शर्त प्यार। उन्हें यह भरोसा चाहिए कि वे अपनी गलतियां, डर और कमजोरियां अपने माता-पिता से साझा कर सकते हैं। हर परिवार को दिन में कुछ समय ऐसा जरूर निकालना चाहिए जब सभी सदस्य बिना मोबाइल के एक-दूसरे से बात करें। बच्चों की बातों को बीच में टोकने या जज करने के बजाय धैर्य से सुनना चाहिए। यदि बच्चा लगातार उदास रहता है, आत्महत्या जैसी बातें करता है, पढ़ाई में अचानक गिरावट आती है या व्यवहार बदलने लगता है, तो तुरंत विशेषज्ञ की सहायता लेनी चाहिए। समय पर मदद कई जिंदगियां बचा सकती है।

फिर भी यदि कभी किसी बच्चे या युवा के मन में आत्महत्या का विचार आए, तो तुरंत सहायता लें। मप्र में बाल अधिकार संरक्षण आयोग बाल अधिकारों की सुरक्षा हेतु निरंतर बच्चों के हित, सर्वोच्च देखभाल और चिंता के लिए ही कार्यरत है। यदि कहीं भी लगता है, कुछ भी गलत हो रहा है, यदि कहीं अंदर अवसाद या नकारात्मकता स्वयं पर हावी हो रही है तो बाल आयोग से सीधे संपर्क किया जा सकता है। प्रदेश में माननीय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादवजी ने अनेक योजनाएं मप्र के बच्चों के हित में चलायी हुई हैं, बच्चे और उनके अभिभावक दोनों ही अपने अनुरूप उन योजनाओं का लाभ उठाएं।

यदि कहीं कोई कठिनाई आ रही है तो मप्र बाल संरक्षण आयोग से सीधे https://www.cpcr.mp.gov.in/ पर संपर्क करें। हमारी वेबसाइट पर अनेक बातें एवं सुविधाओं के बारे में जानकारियां दी गई हैं। आप आयोग के ई-मेल mpcpcr@gmail.com पर दोस्त निवेदिता के नाम पत्र लिख सकते हैं। दूरभाष 0755-2559900/03/04/05/06 पर संपर्क कर सकते हैं। वेबसाइट पर दिए गए अध्यक्ष एवं सदस्यों के नंबरों पर सीधे फोन लगा सकते हैं। याद रखिए, हर बच्चा अनमोल है और हर जीवन बचाया जा सकता है। फिर कभी कोई– ‘ओजस्वी’ गले में फंदा न डाले, हम सभी के प्रयास यही होने चाहिए।

(लेखिका मप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष हैं)