03HREG471 समय,संयम और श्रम से हो पाता है इतिहास विषयक लेखन: डॉ जलज
रतलाम, 3 मार्च (हि.स.)। इतिहास पर लिखना आसान नहीं है। यह लेखन साहित्यिक लेखन से बिल्कुल अलग है । इसमें एक शोधकर्ता की तरह समय भी देना पड़ता है ,संयम भी रखना पड़ता है और श्रम भी करना पड़ता है । जो यह कर सकता है, वही एक अच्छा इतिहास विषयक लेखक हो सकता है। नरेन्द्रसिंह पंवार ने इस बात को साबित भी किया है और एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखकर इस पूरे क्षेत्र को गौरव भी दिलाया है। उक्त विचार राजा भोज जन कल्याण सेवा समिति रतलाम एवं वनमाली सृजन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में ऐतिहासिक एवं मालवा क्षेत्र के राजवंशीय इतिहास को समेटती महत्वपूर्ण पुस्तक परमार (पंवार) राजवंश रत्नमाला पर केंद्रित विमर्श गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि एवं भाषाविद डॉ.जयकुमार जलज ने व्यक्त किए ।
उन्होंने कहा कि नरेन्द्रसिंह पंवार ने न सिर्फ़ अपना समय इस लेखन के लिए दिया है बल्कि युवा लेखकों को यह प्रेरणा भी दी है कि किसी लक्ष्य को पाने के लिए किस तरह समर्पित हुआ जाता है। विशेष अतिथि संस्कृत के विद्वान डॉ.मुरलीधर चांदनीवाला ने कहा कि यह पुस्तक कई सारे संदर्भों को अपने आप में समेटे हुए हैं । इस पुस्तक के माध्यम से न सिर्फ़ राजपूताना शासकों की जानकारी मिलती है बल्कि यह पुस्तक शोध के लिए भी समर्पित प्रतीत होती है ।
चिंतक एवं विचारक विष्णु बैरागी ने कहा कि इस पुस्तक में नरेन्द्रसिंह पंवार का श्रम दीवानगी की हद तक दिखाई देता है । जिस तरह दीवाना होकर कोई काम किया जाता है उसी तरह नरेन्द्रसिंह पंवार ने परमार (पंवार) राजवंश रत्नमाला का लेखन कार्य किया है । शिक्षाविद ओम प्रकाश मिश्र ने कहा कि इतने महत्वपूर्ण विषय को लेकर नरेन्द्रसिंह पंवार ने जो कार्य किया है ,वह एक बेहतर विद्यार्थी और अच्छे व्यक्तित्व का परिचायक है । साहित्यकार आशीष दशोत्तर ने कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से हमें अपने समूचे मालवा क्षेत्र और यहां के ऐतिहासिक वैभव की जानकारियां प्राप्त होती है । इतनी महत्वपूर्ण पुस्तक लिखना कोई आसान कार्य नहीं है। इसमें नरेन्द्रसिंह पंवार को कितने मुश्किलों का सामना करना पड़ा होगा यह महसूस किया जा सकता है।
पुस्तक का प्रिंटिंग कार्य करने वाले सुशील छाजेड़ ने कहा कि नरेन्द्रसिंह पंवार की लगन को देखते हुए इस पुस्तक को बेहतर से बेहतर बनाने का प्रयास किया गया और यह सुखद है कि इस पुस्तक को सभी ने पसंद किया। रतलाम में हाल के वर्षों में इतने विस्तृत कलेवर में प्रिंट होने वाला यह प्रमुख ग्रन्थ है ।
लेखक नरेन्द्रसिंह पंवार ने पुस्तक के बारे में जानकारी प्रदान करते हुए कहा कि परमार (पंवार) राजवंश राजपूतों के 36 राजवंशों में से एक है । इस राज्य वंश का इतिहास भी उतना ही पुराना है जितना कि अन्य राजपूत राजवंशों का । इसी पर केंद्रित एक हज़ार से अधिक पृष्ठों की यह रत्नमाला विगत 15 वर्षों के गहन शोध अध्ययन के उपरांत लिखी गई है । इसमें मालवा के इतिहास पर पहली बार महत्वपूर्ण शोधपरक जानकारियां प्रकाशित हैं। जिसके अंतर्गत विक्रम संवत के प्रवर्तक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य और ज्ञान-विज्ञान के विद्वान नरेश महाराजा भोज पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।
पत्रकार हेमन्त भट्ट ने ग्रंथ को महत्वपूर्ण बताते हुए सुझाव दिया कि आनेवाले समय में इस ग्रंथ को अलग-अलग खंड/भाग के रुप में प्रकाशित किया जाए ताकि पाठकों को पढऩे में आसानी हो सके। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि के रुप में भोपाल से वर्चुअली जुड़े साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश के निदेशक डॉ.विकास दवे ने कहा कि रतलाम जैसे स्थान पर रहकर नरेन्द्रसिंह पंवार ने यह महत्वपूर्ण कार्य किया है जो पूरे मध्य प्रदेश ही नहीं देश भर के लिए प्रेरणादायी है। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक विषय पर लेखन के लिए साहित्यकारों को आगे आना चाहिए जिससे इतिहास संबंधी लेखन और अधिक परिपक्वता के साथ सामने आ पाए।
म प्र सामाजिक विज्ञान शोध संस्थान उज्जैन के निदेशक डॉ.यतीन्द्रसिंह सिसोदिया ने अपने वर्चुअल संदेश में कहा कि हमारे समाज में इतिहास लेखन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। इतिहास जहां एक ओर हमें गौरवशाली अतीत से परिचित करवाता है तो दूसरी ओर हमारे भविष्य के मार्ग को भी प्रशस्त करता है। कार्यक्रम में मंदसौर से वर्चुअली जुड़े इतिहासकार एवं पुराविद् डॉ कैलाश चन्द्र पाण्डेय ने कहा कि राजपूत शासकों की शासन प्रणाली से आम जनमानस को अवगत कराने के लिए यह ग्रंथ बहुत महत्वपूर्ण है।
संगोष्ठी में प्रतिभा चांदनीवाला, नरेन्द्र शर्मा ने भी महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर दिलीपसिंह बेरछा, मधुसूदन अग्रवाल, श्रीमती प्रीति जलज, श्रीमती उमा पंवार, भूपेन्द्रसिंह नरेड़ी, दिलीपसिंह राजवत, जितेन्द्र सिंह राठौर सहित कई विद्वतजन मौजूद थे।