भारत में धर्म और राजनीति को अलग क्यों नहीं देखा गया? - सरस जनवाद

भारत में धर्म और राजनीति को अलग क्यों नहीं देखा गया?

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आज के बौद्धिक विमर्शों में एक विचार बार-बार सुनाई देता है, वह है- “राज्य का कोई धर्म नहीं होना चाहिए। धर्म व्यक्ति का निजी विषय है और राजनीति को उससे अलग रखा जाना चाहिए।” यह अवधारणा आधुनिक लोकतांत्रिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा है, किंतु क्या यह भारतीय सभ्यता की मूल चेतना से मेल खाती है? यही प्रश्न आज गंभीर चर्चा की मांग करता है। दरअसल, भारतीय और पश्चिमी राजनीतिक दर्शन की आधारभूमि अलग-अलग रही है। भारत में जिस ‘धर्म’ की चर्चा होती है, वह पश्चिम के ‘रिलीजन’ का पर्याय नहीं है। इसी मूलभूत अंतर की अनदेखी ने लंबे समय से वैचारिक भ्रम उत्पन्न किया है।

भारतीय दर्शन में धर्म का अर्थ किसी विशेष मत, संप्रदाय या पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। महर्षि वेदव्यास ने कहा है, “धारणाद् धर्ममित्याहुः”, अर्थात जो समाज और सृष्टि को धारण करे, वही धर्म है। सत्य, न्याय, कर्तव्य, मर्यादा, करुणा और लोककल्याण, ये सभी धर्म के अंग हैं। इसी कारण भारतीय परंपरा में ‘स्वधर्म’, ‘राजधर्म’, ‘राष्ट्रधर्म’ और ‘सनातन धर्म’ जैसी अवधारणाएँ विकसित हुईं। यहाँ धर्म व्यक्ति के निजी जीवन से आगे बढ़कर समाज और राज्य की नैतिक दिशा निर्धारित करता है।

सेक्युलरिज्म की उत्पत्ति और भारतीय संदर्भः यूरोप में सेक्युलरिज्म का जन्म चर्च और राजसत्ता के बीच सदियों तक चले संघर्ष की पृष्ठभूमि में हुआ। धार्मिक संस्थाओं के राजनीतिक हस्तक्षेप से उत्पन्न टकराव ने राज्य और चर्च को अलग करने की आवश्यकता पैदा की। भारत का अनुभव इससे बिल्कुल भिन्न रहा। यहाँ राजा स्वयं धर्म के अधीन माना गया। महाभारत से लेकर अर्थशास्त्र और रामायण तक भारतीय ग्रंथों में राजा की शक्ति का स्रोत धर्म और न्याय को माना गया है, न कि उसकी व्यक्तिगत इच्छा को, इसलिए भारतीय चिंतन में राजनीति का उद्देश्य सत्ता नहीं, बल्कि धर्मसम्मत शासन और लोकमंगल रहा है।

राजधर्म : भारतीय शासन-दर्शन की आत्माः भारतीय इतिहास में आदर्श शासक वही माना गया जिसने राजधर्म का पालन किया। भगवान श्रीराम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने व्यक्तिगत सुख से ऊपर राजधर्म को रखा। महाभारत में भीष्म, विदुर और श्रीकृष्ण बार-बार शासक को धर्माधारित शासन का उपदेश देते हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी स्पष्ट करता है कि राज्य का अस्तित्व केवल शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि प्रजा की सुरक्षा, न्याय और समृद्धि के लिए है। यही कारण है कि भारतीय राजनीति में धर्म का अर्थ किसी धार्मिक वर्चस्व से अधिक नैतिक उत्तरदायित्व रहा है।

ऋतम् और पुरुषार्थ : संतुलित जीवन का दर्शनः वैदिक साहित्य में समस्त सृष्टि एक शाश्वत व्यवस्था के अधीन मानी गई है, जिसे ‘ऋतम्’ कहा गया है। इसी व्यवस्था के अनुरूप मानव जीवन के चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—निर्धारित किए गए। इनमें धर्म को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया क्योंकि वही अर्थ और काम को मर्यादित करता है। यदि समाज से धर्म का नैतिक नियंत्रण समाप्त हो जाए, तो आर्थिक विकास भी स्वार्थ का माध्यम बन सकता है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता अराजकता में बदल सकती है। भारतीय दर्शन इसी संतुलन पर बल देता है।

विज्ञान और अध्यात्म : विरोध नहीं, समन्वयः भारतीय परंपरा आधुनिक विज्ञान का विरोध नहीं करती, बल्कि ज्ञान के व्यापक स्वरूप को स्वीकार करती है। आधुनिक विज्ञान मुख्यतः भौतिक जगत की व्याख्या करता है, जबकि भारतीय दर्शन चेतना, प्रकृति और ब्रह्मांड के आध्यात्मिक आयामों पर भी विचार करता है। उपनिषदों और भगवद्गीता का संदेश है कि भौतिक प्रगति आवश्यक है, किंतु उसके साथ आत्मबोध और नैतिकता का संतुलन भी उतना ही आवश्यक है। यही कारण है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में विज्ञान और अध्यात्म को परस्पर पूरक माना गया है।

भारतीय आख्यानों को उनके संदर्भ में समझने की आवश्यकताः भारतीय महाकाव्यों और पुराणों की अनेक कथाओं को केवल आधुनिक वैज्ञानिक कसौटी पर परखने से उनके सांस्कृतिक और दार्शनिक अर्थ छूट जाते हैं। परंपरागत आचार्यों ने इन प्रसंगों को प्रतीकात्मक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों में समझाया है। भारतीय ज्ञान परंपरा का आग्रह है कि किसी भी ग्रंथ का मूल्यांकन उसकी अपनी दार्शनिक पृष्ठभूमि में किया जाए, न कि केवल आधुनिक पश्चिमी दृष्टिकोण से।

आज भारत तीव्र वैश्वीकरण, तकनीकी परिवर्तन और सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। परिवार व्यवस्था, सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान पर नए प्रश्न खड़े हो रहे हैं। धर्मांतरण, सांस्कृतिक अस्मिता, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और सामाजिक समरसता जैसे विषय सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। इन विषयों पर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण हो सकते हैं, किंतु एक बात निर्विवाद है कि किसी भी राष्ट्र की दीर्घकालिक स्थिरता उसके सांस्कृतिक आत्मविश्वास, नैतिक मूल्यों और सामाजिक एकता पर निर्भर करती है।

धर्म का वास्तविक अर्थ : कर्तव्य और उत्तरदायित्वः भारतीय संस्कृति में धर्म का अर्थ केवल मंदिर जाना या धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं है। माता-पिता की सेवा, सत्य का पालन, राष्ट्र के प्रति निष्ठा, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और दुर्बलों की रक्षा भी धर्म के ही स्वरूप हैं। महाराणा प्रताप का संघर्ष, राजा दिलीप का त्याग, आदि शंकराचार्य का राष्ट्रव्यापी सांस्कृतिक अभियान और भगवान श्रीराम का आदर्श शासन, इन सबमें धर्म जीवन-मूल्यों के रूप में प्रकट होता है, किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान के रूप में नहीं। कुल निष्कर्ष रूप में कहें तो भारत में धर्म और राजनीति को कभी दो विरोधी संस्थाएं नहीं माना गया। भारतीय राजनीतिक दर्शन का मूल सिद्धांत यह रहा कि राजसत्ता धर्म अर्थात न्याय, मर्यादा और लोककल्याण के अधीन रहे। यही ‘राजधर्म’ भारतीय राज्य-चिंतन की आत्मा है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ के बीच के अंतर को समझा जाए तथा भारतीय सभ्यता की अवधारणाओं का मूल्यांकन उसकी अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि में किया जाए। आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों और भारतीय सांस्कृतिक दर्शन के बीच संतुलन स्थापित करके ही ऐसा समाज निर्मित किया जा सकता है, जो प्रगतिशील भी हो और अपनी सभ्यतागत जड़ों से जुड़ा भी रहे।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)