भगवान् श्री नृसिंह प्राकट्योत्सव; अहंकार की पृष्ठभूमि पर लिखी गई सर्वनाश की परिभाषा

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भगवान् के अपने ही सेवक अहंकार के वशीभूत होकर जब अनाधिकार चेष्टा एवं अमर्यादित आचरण करते हुए, सिद्ध महात्माओं को अपमानित करने लगते हैं और प्रभु दर्शन में बाधक बन जाते हैं, तब भगवान् श्री हरि दंडस्वरूप उन्हें शापित करवाकर और उनकी अहंकार मूलक मनोवृत्ति का नाश कर उनके अंत:करण को निर्मल स्वरूप प्रदान करते हैं किंतु भगवान् द्वारा किए गए ऐसे दंड विधान के मूल में भी उनकी कृपा ही छिपी होती है, जिसे प्राप्त कर जीव कृतकृत्य हो जाता है।

स्वयं प्रकाश परमात्मा जिनके पावन नामों का उच्चारण करने वाला पुरुष सनातन मोक्ष पद को प्राप्त हो जाता है, वे ही पुराण पुरुषोत्तम भगवान् सम्पूर्ण विश्व के आत्मा, विश्व स्वरूप और सबके स्वामी हैं, वे अपने प्रेमी भक्तों को आत्मा का दिव्य आनंद प्रदान करने एवं दूषित वृत्तियों के विनाश हेतु कभी श्रीराम, श्रीकृष्ण और कभी नृसिंह रुप में इस धरा धाम पर प्रकट होकर जहां अपने निजजनों को प्रेमानंद प्रदान करते हैं, वहीं पाशविक वृत्तियों का नाश कर धर्म राज्य की स्थापना करते हुए जनमानस को निर्भयता प्रदान करते हैं।

दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी से दुर्लभ वरदान प्राप्त कर सप्त द्वीपों के अखंड राज्य सहित इन्द्रासन पर अधिकार प्राप्त कर लिया तथा समस्त लोकों को जीतकर वह दिग्विजयी दैत्यराज सबका एकछत्र सम्राट बनकर स्वच्छंदता पूर्वक विषयों का भोग करते हुए और स्वयं को ईश्वर घोषित कर धर्म पथिकों पर अत्याचार करने लगा, परिणामस्वरूप उसकी आतंकपूर्ण, निरंकुश एवं स्वैच्छाचारी वृत्तियों से मृत्युलोक सहित अन्य सभी लोक भयाक्रांत हो गए और सब तरफ हाहाकार मचने लगा किंतु जब अपनी पापमयी कुत्सित वृत्तियों से वह देवता, वेद, गाय, ब्राह्मण, साधु और धर्म को अपमानित तथा भगवान् से द्वैष करने लगा, तब वरदान जनित शक्ति से संपन्न उस आतंकवादी योद्धा का भगवान् नृसिंह द्वारा वध कर दिया गया।

दैत्यराज हिरण्यकश्यपु के अत्याचार, आतंक और स्वैच्छाचारिता के मूल में अहंकार वश की गई अनाधिकार चेष्टा के साथ ही सेवक धर्म की अवहेलना से उपजा यथार्थ भी था, जिसके परिणामस्वरूप प्रभु प्रेरित होकर सनकादि मुनियों ने प्रभु के दो सेवकों जय और विजय को दैत्य कुल में जन्म लेने का श्राप दिया था। सनकादिकों से शापित जय विजय ही दैत्यों के कुल में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्में और दैत्य समुदाय से मसीहा के रूप में सम्मानित हो गए किंतु उनकी अहंकारी वृत्ति ने अंततः उन्हें पराभव की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। दैत्याधिपति हिरण्यकशिपु विकट तपोसाधना के बल पर भगवान् ब्रह्माजी से दुर्लभ वरदान प्राप्त करने में तो सफल हुआ किंतु वह वरदान लोक हितार्थ नहीं होकर अपने अहंकार की परिपुष्टि करने वाले थे इसलिए वे अंततः उसके विनाश का ही कारण बने।

भगवान् कभी किसी को मारते नहीं बल्कि उसके लोक निंदित कर्मों के लिए उचित दंड विधान सुनिश्चित कर उसे स्वधर्म पालन की ओर अग्रसर करते हैं, वे अपने निज जनों को भी उनके द्वारा किए गए अपराधों के लिए उन्हें क्षमा नहीं करते हैं बल्कि दंड के माध्यम से उन्हें अपनी भूल का एहसास कराते हुए उनकी दोषपूर्ण वृत्तियों का नाश कर उनके हृदय को निर्मल स्वरूप प्रदान करते हैं। इस तरह भगवान् के ऐसे दंड विधान में भी उनके निजजनों का सर्वतोमुखी हित ही समाहित होता है। यही कारण था कि भगवान् श्री विष्णु के सेवकों जय और विजय द्वारा जब सनकादि मुनियों के प्रति उद्दंडतापूर्वक एवं अमर्यादित व्यवहार किया गया तो उन्हें उन महात्माओं द्वारा ही शापित कराकर वैकुंठ लोक से निष्कासित किया गया। जय विजय का हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के दैत्य कुल में जन्म ग्रहण करना तथा उनके द्वारा निंदनीय कर्मों के बाद नियत समय में उनकी वैकुंठ वापसी प्रभु कृपा की अप्रतिम मिसाल है। भगवान् विष्णु के इस अवतार के मूल में केवल प्रह्लाद की रक्षा ही नहीं थी बल्कि उनकी दिव्य प्रेमा भक्ति, प्रभु के प्रति सर्वस्व समर्पण और अटूट आस्था भी थी, जिसके वशीभूत होकर भगवान् श्री हरि विष्णु को अवतार लेने हेतु बाध्य होना पड़ा।

भगवान् नृसिंह के प्राकट्य होने और हिरण्यकशिपु के पराभव ने इस बात को रेखांकित किया है कि सत्ता के अहंकार में लिप्त होकर लोकजीवन को आतंकित एवं भयाक्रांत करने वाले निरंकुश, अत्याचारी और दुष्ट शासक का अंत सुनिश्चित है।

ब्रह्मा के वरदान से आत्ममुग्ध हुआ महाबली हिरण्यकशिपु भयाक्रांत कर देने वाले अपने शासन में आतंक, अत्याचार और उत्पीड़न की नित नई परिभाषाएं लिखने लगा, परिणामस्वरूप उसकी प्रजा दुःख, ग्लानि एवं अवसाद से भर गई और पृथ्वी सहित तीनों लोकों में हाहाकार मच गया किंतु उस वक्त उस दुष्ट के अत्याचार, धर्म की सभी सीमा रेखाओं को लांघ गए, जब अहंकार के मद में वह अपने ही भगवद् परायण पुत्र और भगवान् के प्रिय भक्त प्रह्लाद को मौत के घाट उतारने हेतु उद्यत हो गया, तब भगवान् श्री विष्णु खंब तोड़ कर नृसिंह रुप में प्रकट हुए और दैत्यराज हिरण्यकशिपु के अत्याचार, आतंक एवं स्वैच्छाचारिता का अंत कर धर्म राज्य की स्थापना की तथा प्रह्लाद सहित संपूर्ण लोकजीवन को अभयत्व प्रदान किया। भगवान् विष्णु के विभिन्न अवतारों में यह अवतार पौराणिक काल की ऐसी अद्भुततम घटना थी, जिसने साधना के अहंकार को नेस्तनाबूद कर दिया।

दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने तप के बल पर दिव्य शक्तियां प्राप्त कर उनके दुरुपयोग को ही अपनी सफलता माना था, किंतु जब वह दंडित किया गया तो यह मिथक स्वयंमेव खंड खंड हो गया कि साधन सिद्ध पुरुष ही परम शक्ति है, जिसे कभी कोई चुनौती नहीं दे सकता।

नृसिंह अवतार के माध्यम से भगवान् श्री विष्णु ने एकतरफ जहां दैत्यराज हिरण्यकशिपु की स्वैच्छाचारिता, अमर्यादित आचरण और अत्याचारपूर्ण क्रियाकलापों पर रोक लगाई, वहीं दूसरी तरफ स्वधर्म पालन में रत अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा कर उन्हें अभयत्व भी प्रदान किया। यह भगवान् का अपने निज जनों पर कृपा का ही एक तरीका है। वस्तुत: भगवान् श्रीहरि के नृसिंह रुप में आक्रोश अवतार का उद्देश्य केवल हिरण्यकशिपु का वध नहीं था बल्कि अहंकार के व्यामोह में अपनी मर्यादाओं का हनन कर प्रजाजनों को दारुण दुःख दिए जाने और उन पर अत्याचार किए जाने वाले एक दुष्ट शासक को दंड देकर सुधारने की एक प्रक्रिया थी, साथ ही उसमें अपने भक्त की रक्षा कर उसे अभयत्व प्रदान करने का महाविधान भी समाहित था।