अंबिकापुर : सरगुजिहा बोली बनी विवाद की वजह, बच्चे को नहीं मिला दाखिला, जांच के आदेश

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अंबिकापुर, 17 अप्रैल । छत्तीसगढ़ के सरगुजा में एक निजी प्री-प्राइमरी स्कूल में बच्चे को प्रवेश नहीं देने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। आरोप है कि स्थानीय सरगुजिहा बोली बोलने के कारण बच्चे को दाखिला देने से इनकार कर दिया गया। मामले में कलेक्टर ने जांच के निर्देश दिए हैं, वहीं राजनीतिक और छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया भी सामने आई है।

सरगुजा के चोपड़ापारा क्षेत्र में संचालित स्वरंग किड्स एकेडमी में यह विवाद सामने आया है। परिजनों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन ने उनके बच्चे को सिर्फ इसलिए प्रवेश नहीं दिया, क्योंकि वह सरगुजिहा बोली में बात करता है। जानकारी के अनुसार, राजकुमार यादव अपने बेटे सत्यम का नर्सरी में प्रवेश कराने स्कूल पहुंचे थे। प्रक्रिया के तहत स्कूल प्रबंधन और शिक्षकों ने बच्चे से कुछ सवाल किए, जिनका जवाब उसने सरगुजिहा बोली में दिया। इसके बाद बच्चे को एक प्रदर्शन कक्षा (डेमो क्लास) में भेजा गया।

परिजनों का कहना है कि कक्षा के बाद स्कूल ने यह कहते हुए प्रवेश देने से इनकार कर दिया कि यहां बड़े घरों के बच्चे पढ़ते हैं और वे आपके बच्चे की भाषा सीख जाएंगे, इसलिए उसे दाखिला नहीं दिया जा सकता। इस फैसले से परिजन काफी आहत हैं। राजकुमार यादव ने आज शुक्रवार काे बताया कि उनके घर में सभी लोग सरगुजिहा बोली में ही बात करते हैं, इसलिए उनका बेटा फिलहाल यही भाषा समझता है। उन्हें उम्मीद थी कि स्कूल में दाखिला मिलने के बाद वह धीरे-धीरे हिंदी सीख जाएगा।

इस पूरे मामले की शिकायत उन्होंने सरगुजा कलेक्टर अजीत वसंत से की है, जिसके बाद कलेक्टर ने जांच के आदेश जारी कर दिए हैं।

वहीं, स्कूल की प्रिंसिपल नेहा सिंह ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भाषा के आधार पर प्रवेश से इनकार करने का आरोप पूरी तरह गलत है। उनके अनुसार, स्कूल में पहले प्रदर्शन कक्षा के माध्यम से यह देखा जाता है कि बच्चा कक्षा के माहौल में खुद को ढाल पा रहा है या नहीं। इस मामले में बच्चा शिक्षकों की बात समझ नहीं पा रहा था और शिक्षक भी उसे ठीक से समझा नहीं पा रहे थे, इसलिए उसके हित को देखते हुए प्रवेश नहीं दिया गया।

मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने कहा कि यदि किसी बच्चे को उसकी बोली के कारण प्रवेश नहीं दिया जा रहा है, तो ऐसे स्कूल को बंद कर देना चाहिए और शिक्षा विभाग को तत्काल जांच करनी चाहिए।

एनएसयूआई ने भी इस मामले को लेकर विरोध जताया है। संगठन ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर स्कूल का पंजीयन रद्द करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह स्थानीय बोली का अपमान है, जबकि कई सरकारी नौकरियों में स्थानीय भाषा का ज्ञान अनिवार्य माना जाता है।

फिलहाल, प्रशासनिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि बच्चे को प्रवेश नहीं देने के पीछे वास्तविक कारण क्या था, लेकिन इस घटना ने स्थानीय भाषा और शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।