वाराणसी, 13 अक्टूबर । उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी (काशी) में शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन मंगलवार को मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा के दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। चौक स्थित चित्रघंटा गली में माता के दरबार में भोर से ही भक्तों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। मां के विग्रह के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की कतार लक्खी चौतरा तक लगी रही। भक्तों ने अपनी बारी आने पर ‘ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः’ मंत्र का जाप करते हुए माता के चरणों में नारियल और चुनरी अर्पित की तथा सुख-समृद्धि, पारिवारिक शांति और संतान की मंगलकामना की। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर ‘सांचे दरबार की जय’ और ‘जय माता दी’ के जयकारों से गूंजता रहा।
इससे पहले भोर में महंत की देखरेख में माता के विग्रह को पंचामृत स्नान कराया गया। इसके बाद देवी को नवीन वस्त्र धारण कराकर विधिवत शृंगार किया गया। भोग अर्पित करने के बाद मंगला आरती हुई और मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिए गए।
नवरात्र के तीसरे दिन पूजित मां चंद्रघंटा को आदिशक्ति का सौम्य और शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, इसी कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। देवी की दस भुजाएं हैं, जिनमें खड्ग, बाण और गदा सहित विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनके घंटे की प्रचंड ध्वनि से असुर भयभीत हो उठते हैं।
मान्यता है कि जब असुरों के बढ़ते प्रभाव से देवता त्रस्त हो गए, तब आदिशक्ति ने मां चंद्रघंटा के रूप में अवतार लेकर उनका संहार किया और देवताओं को संकट से मुक्ति दिलाई। देवी के इस स्वरूप की आराधना से साधक को भय से मुक्ति, साहस और शक्ति प्राप्त होती है। आध्यात्मिक मान्यताओं में मां चंद्रघंटा का संबंध मणिपुर चक्र से बताया गया है, जबकि ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार उनका संबंध मंगल ग्रह से है।
माता की कृपा प्राप्त करने के लिए श्रद्धालु मंदिर में पीतल की घंटी अर्पित करने के साथ अनाज, जैसे गेहूं और चावल, तथा धन का दान भी करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक की गई पूजा-अर्चना से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
शारदीय नवरात्र के चौथे दिन दुर्गाकुंड स्थित मां कूष्मांडा के मंदिर में दर्शन-पूजन का विधान है। इस बार दस दिवसीय नवरात्र के चलते श्रद्धालुओं को मां के दर्शन-पूजन का अवसर दो दिनों तक मिलेगा। मान्यता है कि मां कूष्मांडा की आराधना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और भक्तों को दुखों से मुक्ति मिलती है। मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं। उनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत से भरा कलश, चक्र और गदा सुशोभित हैं। देवी के आठवें हाथ में जपमाला धारण करने की मान्यता है। मां कूष्मांडा को सृष्टि की सृजनकर्ता और जगत का पालन करने वाली देवी के रूप में भी पूजा जाता है। नवरात्र के चौथे दिन उनके दर्शन-पूजन के लिए काशी के दुर्गाकुंड स्थित मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने की संभावना है।
