विश्व बदल रहा है, भारत को अपने आर्थिक विकल्प बढ़ाने होंगे

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किसी बड़ी अर्थव्यवस्था की ब्याज दरें वैश्विक पूंजी का रुख बदलने लगें और शक्तिशाली देश की व्यापार नीति विश्व के कई देशों को प्रभावित करने लगे, तब असल परीक्षा हर उस देश के लिए होती है, जिसे अपनी अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाना भी है और अपनी इकोनॉमी को मजबूत बनाए भी रखना है। भारत भी इन दिनों कुछ इसी तरह की परिस्थितियों से गुजर रहा है। देश के सामने यही सबसे बड़ा आर्थिक चिंता का कारण यही है कि उसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को अब अपनी गति के साथ अपनी सुरक्षा, प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक स्वायत्तता के साथ निरंतर मजबूत बनाकर रखा जाए।

वित्त मंत्रालय की आर्थिक समीक्षा ने इसी बदलते परिदृश्य की ओर संकेत करते हुए कहा है कि कोविड के बाद मिली विकास उपलब्धियों को सहज मानकर आगे बढ़ने का समय समाप्त हो चुका है। भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण, वैश्विक ब्याज दरें, पूंजी प्रवाह, आपूर्ति व्यवधान और मुद्रास्फीति जैसे कारक लगातार आर्थिक निर्णयों की परीक्षा ले रहे हैं। ऐसे में भारत को व्यापार-अनुकूल व्यवस्था से आगे बढ़कर प्रतिस्पर्धा-अनुकूल अर्थव्यवस्था का निर्माण करना होगा। वस्तुत: इसी में भारत की अगली आर्थिक यात्रा का मूल छिपा है।

विकास दर अर्थव्यवस्था की गति बताती है, उसकी संपूर्ण शक्ति का परिचय नहीं देती। स्थायी आर्थिक शक्ति के लिए बेहतर शासन, तेज निर्णय प्रक्रिया, नवाचार, उत्पादकता, विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा और वैश्विक बाजारों में भारतीय कंपनियों की मजबूत उपस्थिति जरूरी है। आर्थिक समीक्षा ने भी राज्य की बढ़ी हुई क्षमता और बेहतर शासन को प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था की प्रमुख शर्त माना है। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत की आर्थिकी को संस्थागत क्षमता पर केंद्रित होना चाहिए, जिसमें कि ऊर्जा सुरक्षा इस चुनौती का सबसे संवेदनशील पक्ष है।

उल्लेखित है कि भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। समुद्री मार्ग में व्यवधान अथवा कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि का असर परिवहन, उद्योग, बिजली, उपभोक्ता बाजार और मुद्रास्फीति तक पहुंचता है। ऐसे समय में किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता आर्थिक जोखिम को बढ़ा सकती है, इसलिए ऊर्जा आपूर्ति का बहुस्रोतीकरण और वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग आर्थिक नीति के स्थायी हिस्से बनने चाहिए। इसी सोच का विस्तार निर्यात बाजारों तक होता है।

कहना होगा कि भारत के लिए अमेरिका अत्यंत महत्वपूर्ण बाजार है। वहां भारतीय दवाइयों, वस्त्रों, रत्न एवं आभूषणों तथा विभिन्न विनिर्मित वस्तुओं की मांग भारतीय उद्योगों और रोजगार से सीधे जुड़ी हुई है। उसका असर उत्पादन केंद्रों, छोटे उद्यमों, श्रमिकों और स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है।यहीं से निर्यात विविधीकरण का महत्व सामने आता है। क्योंकि अमेरिका ने जिस तरह से टैरिफ के नाम पर भारत समेत दुनिया के देशों पर अपना दबाव बनाना जारी रखा है, उसे देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि भारत अपने लिए अधिकतम निर्यात के अवसर तलाशे।

इस सबंध में जैसा कि ज्ञात है, यूरोपीय संघ उच्च मूल्य वाले बाजारों के लिए अवसर देता है। आसियान भौगोलिक निकटता और विनिर्माण संपर्क के कारण महत्वपूर्ण है। खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए व्यापार, निवेश और बुनियादी ढांचे के अवसर खोलता है। अफ्रीका तेजी से उभरता उपभोक्ता बाजार है, जबकि लैटिन अमेरिका भारतीय ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि-रसायन और सूचना प्रौद्योगिकी के लिए नए अवसर प्रस्तुत करता है।

वस्तुत: इस विविधता का उद्देश्य किसी एक बाजार से दूरी बनाने के स्थान पर भारतीय व्यापार को कई बाजारों में फैलाना है, ताकि किसी एक क्षेत्र में आया झटका पूरे निर्यात ढांचे को प्रभावित करने की स्थिति तक पहुंच सके। भारत के लिए ब्रिक्स भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण आर्थिक मंच है। ब्रिक्स देशों के बीच माल व्यापार दो दशकों में 13 गुना बढ़कर 1.17 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। अब आवश्यकता ऐसे सहयोग की है, जो घोषणाओं से आगे बढ़कर सीमा शुल्क सुधार, व्यापार वित्त, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल दस्तावेजीकरण और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में छोटे उद्यमों की भागीदारी तक पहुंचे।यहां भारत के एमएसएमई क्षेत्र की भूमिका निर्णायक भी हो सकती है। जिसमें कि भारत वैश्विक बाजार की दृष्टि से अभी भी पिछड़ा हुआ है।

इस मामले में हमें चीन से सीखना चाहिए, जो अपने उद्योगपतियों को विदेश में सफल होने, उनके माल को विश्व के 192 देशों तक पहुंच बनाने के लिए अलग से अनेक प्रयास करता है। हालांकि भारत भी इस दिशा में ागे बढ़ रहा है, किंतु उसकी वैसी आक्रामक शैली नहीं, जैसी चीन अपनाए हुए है, इसलिए भारत की वैश्विक आर्थिक क्षमता का वास्तविक विस्तार तब होगा, जब छोटे और मध्यम उद्यम अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं के स्थायी भागीदार बनेंगे। वित्त, तकनीक, बाजार और प्रमाणन से जुड़ी बाधाओं को घटाकर उन्हें वैश्विक उत्पादन नेटवर्क से जोड़ना जरूरी है। इससे रोजगार, निर्यात और स्थानीय उत्पादन क्षमता तीनों को मजबूती मिल सकती है।

इसके साथ तकनीक भी आर्थिक प्रतिस्पर्धा का केंद्रीय आधार बन रही है। भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, डिजिटल भुगतान, सूचना प्रौद्योगिकी और स्टार्टअप क्षमता को वैश्विक साझेदारियों से अधिक से अधिक जोड़ा जाना चाहिए। कुछ प्रयास पिछले दिनों शुरू भी हुए हैं, किंतु वास्तविकता में वह संतोषजनक नहीं कहे जा सकते हैं। आज भारत के सामने अमेरिका, यूरोपीय संघ, आसियान, खाड़ी, जी20, क्वाड और ब्रिक्स जैसे अनेक मंच हैं। इन सभी के साथ संबंधों को परस्पर विरोधी खांचों में देखने के बजाय भारतीय हितों के अनुरूप पूरक आर्थिक अवसरों के रूप में विकसित किया जा सकता है। यहां भी प्रयासों के स्तर पर हर संभव तेजी लाने की आवश्यकता है।

भारत के लिए अगला दशक इसी कसौटी पर महत्वपूर्ण होगा। हो सकता है, वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता बनी रह सकती है। व्यापार नीतियां बदल सकती हैं। पूंजी का प्रवाह दिशा भी कहो, बदलता हुआ दिखे। ऊर्जा बाजारों में उतार-चढ़ाव आ सकता है। वस्तुत: ऐसे प्रत्येक परिवर्तन के बीच भारत की सफलता इस बात से तय होगी कि उसकी अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने में सक्षम है, इसलिए आज विकास भारत की उपलब्धि है। प्रतिस्पर्धा उसकी अगली परीक्षा है। विविधीकरण उसकी सुरक्षा है और अपने विकल्पों का विस्तार उसकी वास्तविक आर्थिक स्वतंत्रता होगी।

अत: यहां कहना यही है कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत के लिए यही वह सोच है, जो उसे परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया देने वाली शक्ति से आगे ले जाकर परिस्थितियों को प्रभावित करने वाली आर्थिक शक्ति बना सकती है। वैसे उम्मीद है कि केंद्र की मोदी सरकार इस दिशा में प्रयास कर ही रही होगी। फिर भी देश में जो लघु और मध्यम उद्योगों के सामने बाजार प्राप्त करने की जो चुनौतियां पैदा हो रही हैं, उनका निराकरण बेहद जरूरी है। चीन की तरह जितना अधिक बाजार हमारे हाथों में होगा, हम विश्व बाजार के उतने बड़े खिलाड़ी होंगे।