भागलपुर, 22 अक्टूबर । बिहार के गौरव और ‘सिल्क सिटी’ के नाम से मशहूर भागलपुर जिले के कतरनी चावल और जर्दालू आम के बाद अब यहां के बुनकरों के हुनर को एक वैश्विक पहचान मिलने जा रही है। जिला प्रशासन और कपड़ा मंत्रालय के सहयोग से भागलपुरी सिल्क (टसर और मटका सिल्क) की शुद्धता और उसकी जीआई टैगिंग को सुरक्षित रखने के लिए एक विशेष ‘डिजिटल क्यूआर कोड’ पहल की शुरुआत की जा रही है।
अक्सर बाजार में भागलपुरी सिल्क के नाम पर नकली या सिंथेटिक कपड़े बेचकर पर्यटकों और खरीदारों को ठगा जाता है, जिससे यहाँ के स्थानीय बुनकरों को भारी नुकसान उठाना पड़ता था। इस नई तकनीक के आने से अब हर मूल भागलपुरी सिल्क उत्पाद पर एक यूनिक क्यूआर कोड अंकित होगा। जैसे ही कोई ग्राहक अपने स्मार्टफोन से इस कोड को स्कैन करेगा, उसे कपड़े के धागे की शुद्धता, उसे बनाने वाले बुनकर का नाम, गांव और उसकी निर्माण तिथि की पूरी जानकारी मिल जाएगी। चंपानगर और नाथनगर के स्थानीय बुनकर संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया है।
बुनकरों का कहना है कि इससे न केवल उनकी मेहनत को सही दाम मिलेगा, बल्कि बिचौलियों के खेल पर भी लगाम लगेगी। जिला प्रशासन के अनुसार, पहले चरण में जिले के 5,000 से अधिक पंजीकृत बुनकरों को इस डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जा रहा है, और आने वाले त्योहारों के सीजन में यह तकनीक पूरी तरह से बाजार में दिखने लगेगी। अब देश-विदेश के खरीदार बिना किसी डर के असली भागलपुरी सिल्क का आनंद ले सकेंगे।
