नैनीताल, 28 सितंबर । उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने पुलिस विवेचना और वैज्ञानिक साक्ष्यों से संबंधित रिपोर्ट समय पर उपलब्ध नहीं होने पर चिंता जताते हुए राज्य पुलिस को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने विशेष रूप से दुष्कर्म, पॉक्सो, एनडीपीएस और अन्य जघन्य अपराधों के मामलों में फोरेंसिक रिपोर्ट निर्धारित समयसीमा के भीतर उपलब्ध कराने को कहा है।
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने आनंद प्रकाश धवन की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश दिए। मामले में राज्य के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव की ओर से दाखिल शपथपत्र में बताया गया कि प्रदेशभर में 150 पुलिस अधिकारियों की एक इन्वेस्टिगेशन सेल गठित कर तैनात की गई है। आवश्यकता के अनुसार भविष्य में इस संख्या को बढ़ाया जा सकता है।
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि लंबित विवेचनाओं की समय-समय पर समीक्षा के लिए संबंधित अधिकारियों को सर्कुलर जारी किए गए हैं। सरकार ने यह भी भरोसा दिलाया कि उच्चतम न्यायालय के जोगेन्दर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश सरकार तथा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामलों में दिए गए निर्देशों का सख्ती से पालन किया जाएगा।
अदालत को बताया गया कि जिन मामलों में चार्जशीट दाखिल करने की वैधानिक अवधि 90 या 60 दिन है, उनमें फोरेंसिक रिपोर्ट क्रमशः 75 और 45 दिनों के भीतर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमों में वैज्ञानिक साक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के निदेशक की जिम्मेदारी है कि निर्धारित अवधि समाप्त होने से पहले संबंधित विवेचक को रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाए।
डीजीपी की ओर से एसएसपी को निर्देश दिए गए हैं कि नमूने लिए जाने के एक सप्ताह के भीतर उन्हें फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी भेजना सुनिश्चित किया जाए। अदालत को यह भी जानकारी दी गई कि फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी में वैज्ञानिक अधिकारियों की संख्या 11 से बढ़ाकर 28 कर दी गई है।
हाईकोर्ट ने डीजीपी को प्रदेश के प्रत्येक शहर में नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की सलाह भी दी। इन कार्यक्रमों में न्यायिक अधिकारियों और मुकदमों के संचालन का व्यापक अनुभव रखने वाले अधिवक्ताओं की सेवाएं लेने को कहा गया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 30 सितंबर काे निर्धारित की है।