रांची, 08 सितंबर । झारखंड उच्च न्यायालय ने रांची के कांके अंचल स्थित नगड़ी गांव की 2.98 एकड़ अधिग्रहित जमीन को अधिग्रहण से मुक्त कर मूल रैयतों को वापस करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित जमीन का वर्ष 1957-58 में विधि सम्मत तरीके से अधिग्रहण किया गया था। अधिग्रहण की प्रक्रिया के बाद अवॉर्ड पारित किया गया और मुआवजे का भुगतान भी किया जा चुका है। ऐसी स्थिति में केवल इस आधार पर कि बाद में जमीन का उपयोग किसी दूसरे सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किया गया, उसे मूल रैयतों को वापस नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता खुद को मूल अवार्डियों का वैध कानूनी उत्तराधिकारी साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज और वंशावली प्रस्तुत नहीं कर सके। इस आधार पर भी अदालत ने माना कि याचिकाकर्ताओं के मामले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।
याचिकाकर्ताओं ने नगड़ी गांव के प्लॉट संख्या 2055, 2124, 2068, 2281 और 2882 की कुल 2.98 एकड़ जमीन को अधिग्रहण से मुक्त करने की मांग की थी। उनका दावा था कि उक्त जमीन उनके पूर्वजों के नाम रिकॉर्ड ऑफ राइट्स में दर्ज थी और वे लंबे समय से उस पर कब्जे में हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उनके पक्ष में नियमित रूप से राजस्व रसीद भी जारी होती रही है।
याचिका में कहा गया था कि बिरसा कृषि कॉलेज, कांके के लिए नगड़ी गांव की करीब 202.07 एकड़ जमीन के अधिग्रहण को लेकर भूमि अधिग्रहण वाद संख्या 21/1957-58 शुरू किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने 19 दिसंबर 1968 के भूमि अधिग्रहण अधिकारी, रांची के आदेश और 31 जनवरी 1970 को छोटानागपुर प्रमंडल के आयुक्त की ओर से जमीन को मुक्त करने की अनुशंसा का हवाला दिया था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि अधिग्रहित जमीन का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए नहीं किया गया। इसलिए जमीन को अधिग्रहण से मुक्त कर मूल रैयतों अथवा उनके उत्तराधिकारियों को वापस किया जाना चाहिए।
वहीं, राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मामला करीब 66 वर्ष की देरी के बाद अदालत में लाया गया है। सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे हैं कि वे मूल अवार्डी के वैध कानूनी उत्तराधिकारी हैं। राज्य सरकार के अनुसार, भूमि अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया कानून के तहत पूरी की गई थी, अवॉर्ड पारित हुआ था और संबंधित मुआवजे का भुगतान भी किया जा चुका था।
सुनवाई के दौरान बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की ओर से अदालत को बताया गया कि अधिग्रहित जमीन के कुछ हिस्से का इस्तेमाल अब अन्य सार्वजनिक संस्थानों और परियोजनाओं के लिए किया जा चुका है। विश्वविद्यालय के अनुसार, जमीन का एक हिस्सा नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (एनयूएसआरएल), रांची को दिया जा चुका है, जबकि कुछ जमीन का उपयोग रांची रिंग रोड के निर्माण में हुआ है। विश्वविद्यालय ने दूसरे सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जमीन के इस्तेमाल को लेकर अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) भी दिया था।
एनयूएसआरएल की ओर से भी अदालत को बताया गया कि संबंधित अधिग्रहित जमीन के कुछ हिस्से का इस्तेमाल विश्वविद्यालय के भवन एवं अन्य निर्माण कार्यों में किया जा चुका है। यह जमीन पूर्व में डिवीजन बेंच के समक्ष हुई न्यायिक कार्यवाही का भी हिस्सा रही है।
उच्च न्यायालय ने मामले के रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों का अवलोकन करने के बाद कहा कि संबंधित जमीन भूमि अधिग्रहण वाद संख्या 21/1957-58 के तहत अधिग्रहित की गई थी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने स्वयं भी भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू होने की बात स्वीकार की है।
अदालत ने राज्य सरकार के जवाब के साथ संलग्न दस्तावेजों तथा अंचल अधिकारी की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया। इन दस्तावेजों से जमीन के विधि सम्मत अधिग्रहण की पुष्टि होती है। अदालत ने माना कि जब अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी हो, अवॉर्ड पारित हो चुका हो और मुआवजे का भुगतान किया जा चुका हो, तब महज बाद में भूमि का उपयोग किसी अलग सार्वजनिक उद्देश्य के लिए होने के आधार पर अधिग्रहण को समाप्त कर जमीन मूल रैयतों को लौटाने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इन परिस्थितियों में अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर याचिका में हस्तक्षेप का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया और उसे खारिज कर दिया।
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