संसार के समस्त शुभ कर्मों का मूल सत्संग ही है – स्वामी अवधेशानन्द गिरि
महाकुम्भ नगर, 07 जनवरी (हि.स.)। सनातन धर्म संस्कृति की दिव्य अभिव्यक्ति के महापर्व महाकुंभ प्रयागराज में अन्नपूर्णा मार्ग सेक्टर 18 में जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि ने श्रीमद भागवत कथा में कहा कि शुकदेव-परीक्षित सम्वाद के साथ मनु-शतरूपा प्रसंग, कर्दम देवहूति विवाह तदनन्तर भगवान कपिल देवहूति सम्वाद के द्वारा सांख्य योग की सिद्धता, साकारता एवं जीवन की सिद्धि में आहार-विहार की भूमिका को रेखांकित किया। भगवान कपिल के उपदेशों को उल्लेखित करते हुए उन्होने कहा कि संसार के समस्त शुभ कर्मों का मूल सत्संग ही है। इन सभी प्रसंग को प्रतीकात्मक रूप से समझाते हुए पूज्यश्री जी कहते हैं, कि संसार की प्रथम रचना स्त्री है! अतः उसका अनादर न हो।आब्रह्म-कीट-जननी वर्णाश्रम-विधायिनी वह जीव से लेकर ब्रह्म की जननी है। उसका यह विराट स्वरुप हमें नित्य स्मरण रहे। यही हमारी भारतीय संस्कृति है। स्वामी अवधेशानंद ने कहा कि अध्यात्म स्वभाव की यात्रा का नाम है। जहाँ अजेयता-अमरता और चिरकाल तक आनन्द है। जब जीवन में अध्यात्म का जागरण होता है, तब जीवन में नैतिकता, ऐन्द्रिक संयमन, विनयशीलता और सत्य का आगमन होने लगता है। जीवन में अध्यात्म के आने से जगत से हमारा ध्यान हटकर सत्य को ओर, उस परम सत्ता, ब्रह्म की ओर लगने लगता है। जैसे स्वप्न का धन हमें धनी नहीं बना सकता, ठीक वैसे ही ज्ञान चक्षु खुलने के पश्चात वास्तविकता का पता चलता है कि जगत सत्य नहीं है। सत्य नित्य विद्यमान सत्ता है, नित्य चैतन्य है। सत्य की अनुपस्थिति ही असत्य है। असत्य कभी होता ही नहीं, बस उसका भास-आभास हो सकता है। वेदों में भगवान का नाम सच्चिदानन्द बताया गया है। सत्य से विद्या, विभूति तथा इहलौकिक व पारलौकिक सभी अनुकूलताएँ स्वत: ही प्राप्त किये जा सकते हैं। जहाँ धर्म और सत्य है, वहीं जय है – “यतो धर्मस्ततो जयः.”। विद्या विनय देती है। विद्या सत्य और धर्म का प्रकाशन करती है। यह वेद का आदेश वाक्य है – “सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः त्यागानुसारिणी कीर्ति:।”
राजा परीक्षित की कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि भले ही वह मायावी मुकुट धारण करते ही राजा की बुद्धि भ्रष्ट हो गई हो, उनके सारे पुण्य कर्म क्षीण हो गए हो, पर फिर भी यह भागवत कथा के प्राकट्य के शुभ संदेश थे। जिसका श्रवण कर परीक्षित भवसागर से पार हो गए। तब से तारण की यह कथा निरन्तर गतिमान है।विचार से ही विराटता आती है। विचार विराट है तो आप विराट हैं। इसलिए हम अपनी दुर्बलताओं का, अपनी अज्ञानता का त्याग करना सीखें।