सरस जनवाद

हिमंत पर योगी स्टाइल में काम करने का आरोप

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हिमंत बिस्व सरमा को असम का मुख्यमंत्री बने अभी दो महीने ही बीते हैं, लेकिन इस दौरान राज्य में 34 से अधिक ‘एनकाउंटर’ हुए जिनमें 15 अपराधी मारे गए हैं.

वहीं पुलिस से कथित तौर पर सर्विस हथियार छीनने और हिरासत से “भागने की कोशिश” में क़रीब 24 अपराधी घायल भी हुए हैं. मारे गए अपराधियों में चरमपंथी संगठन के सदस्य भी शामिल हैं.

पुलिस के अनुसार इन तमाम लोगों को चरमपंथ, बलात्कार, हत्या, नशीली दवाओं की तस्करी, पशु तस्करी और डकैती जैसे अपराधों के लिए पकड़ा गया था.

इस बीच शुक्रवार को मोरीगांव ज़िले में एक और ‘एनकाउंटर’ की घटना सामने आई हैं जिसमें एक संदिग्ध ड्रग तस्कर घायल हुआ है. ऐसा कहा जा रहा है कि ड्रग तस्कर ने कथित तौर पर पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश की थी.सर्बानंद सोनोवाल

सर्बानंद सोनोवाल के शासन में नहीं हुआ एनकाउंटर

असम में 2016 से बीजेपी शासन कर रही है. इससे पहले सर्बानंद सोनोवाल राज्य के मुख्यमंत्री थे, लेकिन उनके पांच साल के कार्यकाल में पुलिस ‘एनकाउंटर’ की कोई भी घटना इतनी चर्चा में नहीं आई. लिहाजा दो महीने में 34 से अधिक ‘एनकाउंटर’ की घटनाओं को लेकर प्रदेश का राजनीतिक माहौल गरमा गया है.

प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और क्षेत्रीय दल असम जातीय परिषद ने फ़रार अपराधियों से निपटने के लिए ‘मुठभेड़ों’ के इस पैटर्न पर सवाल खड़े किए हैं.

विपक्षी दल अपराध की जांच के लिए पुलिस द्वारा की गई शूटिंग को कथित तौर पर प्रोत्साहित करने के लिए मुख्यमंत्री की आलोचना कर रहे हैं. हालांकि, असम पुलिस ने इन तमाम आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया कि चरमपंथियों और अपराधियों ने ही पुलिसकर्मियों को गोलीबारी का सहारा लेने के लिए मजबूर किया था.

एनकाउंटर की शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में

लेकिन असम में बीते दिनों हुए इन ‘एनकाउंटर्स’ की शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दर्ज कराई गई है. दिल्ली में वकालत कर रहे असम के आरिफ़ जवादर ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में पुलिस हिरासत से पिस्तौल छीनने के प्रयास में छोटे अपराधियों को गोली मारने की शिकायत दर्ज कराई है.

बीते 10 जुलाई को दर्ज कराई गई अपनी शिकायत में आरिफ़ ने कहा कि कथित छोटे अपराधियों को गोली मारी जाती है और इस तरह की ‘फ़र्जी मुठभेड़ों’ का कारण ये बताया जाता है कि उन्होंने “पुलिस हिरासत से पिस्तौल छीनकर भागने” की कोशिश की थी.

प्रदेश में रोज़ाना सामने आ रही ‘एनकाउंटर’ की इन घटनाओं पर एडवोकेट आरिफ़ ने बीबीसी से कहा, “राज्य में बीते पांच साल भी बीजेपी की सरकार थी, लेकिन हमने असम में इस तरह के एनकाउंटर नहीं देखे. मैंने अपनी पढ़ाई यूपी में की है और वहां योगी सरकार आने के बाद इस तरह के ‘एनकाउंटर’ की घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन हमारे राज्य में पिछले 15 साल में भी ऐसी घटनाएं नहीं हुईं.”

आरिफ़ बताते हैं, “असम पुलिस सभी मामलों में एक जैसी बात ही कह रही है कि अपराधी सर्विस पिस्टल को छीनकर भागने की कोशिश कर रहा था, इसलिए उसे गोली मारी गई.”आरिफ़

वे कहते हैं, “अगर अपराधी पिस्टल लेकर भागेगा तो वो गोली भी चलाएगा, लेकिन किसी मामले में पुलिस ने ये नहीं कहा कि अपराधी ने गोली चलाई है या फिर पुलिस का कोई जवान घायल हुआ है. ऐसे में पुलिस की कार्रवाई पर संदेह होता है. ये पूरी तरह मानवाधिकार के उल्लंघन का मामला है.”

एडवोकेट ने मुठभेड़ों के 10 मामलों को सूचीबद्ध किया है जहां कथित अपराधी या तो मारे गए या घायल हुए हैं. वो कहते हैं, “मैंने मानवाधिकार आयोग में असम पुलिस के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करवाई है. आयोग ने इस मामले को डायरी में दर्ज किया है और जल्द ही पुलिस को नोटिस जारी किया जाएगा.”

इस तरह के ‘एनकाउंटर’ के क्या कारण हो सकते हैं? इस सवाल का जवाब देते हुए एडवोकेट आरिफ़ कहते है, “असल में गायों की सुरक्षा के लिए सरकार जो नया बिल लेकर आई है उसके कुछ प्रावधानों को लेकर लोगों को आपत्तियां हैं. लिहाजा लोगों की आपत्तियों से ध्यान भटकाने के लिए ये सब कुछ किया जा रहा है. वरना इस तरह गाय की तस्करी करने वाले छोटे अपराधी को मारने का क्या कारण हो सकता है, जबकि गाय की तस्करी आर्थिक अपराध की श्रेणी में आती है.”पुलिस एनकाउंटर में मारे गए जोयनाल

क्या कहता है एनकाउंटर में मारे गए जोयनाल का परिवार?

बीते 11 जुलाई को नौगांव ज़िले में पुलिस एनकाउंटर में मारे गए 47 साल के जोयनाल आबेदीन पर डकैती और हथियार लूटने के आरोप हैं.

पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर दावा किया कि जोयनाल के नेतृत्व में एक हथियारबंद गिरोह ढिंग इलाके में डकैती की योजना बना रहा था. इसलिए 11 जुलाई की रात क़रीब 2 बजे नौगांव पुलिस जोयनाल के घर उसे पकड़ने गई थी.

इस एनकाउंटर के बाद नौगांव ज़िले के पुलिस अधीक्षक आनंद मिश्रा ने मीडिया से बात करते हुए कहा था, “हमारे जवानों ने जोयनाल के घर की घेरेबंदी की और उन्हें घर से बाहर आने के लिए आवाज़ दी. लेकिन जोयनाल ने घर से बाहर निकलते ही फ़ायरिंग शुरू कर दी. इसलिए पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की और उनके पैर में गाली मारी गई. इसके बाद उन्हें तुरंत नज़दीकी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.”

पुलिस का कहना है कि जोयनाल एक स्थानीय ‘बाहुबली’ था और उसके ख़िलाफ़ एनआरसी सेवा केंद्र से हथियार लूटने और एसिड हमला करने समेत चार मामलों में प्राथमिकी दर्ज थी.

लेकिन जोयनाल के परिवार के लोग इस घटना को पूरी तरह फ़र्ज़ी एनकाउंटर बता रहे हैं. जोयनाल के चचेरे भाई इमदादुल हक़ ने 11 जुलाई की घटना का ज़िक्र करते हुए बीबीसी से कहा, “उस दिन आधी रात क़रीब 3 बजे पुलिस घर पर आई थी. वे लोग दरवाज़े पर जोयनाल को नाम से पुकार रहे थे. जब मेरे भाई जोयनाल ने दरवाज़ा खोला तो पुलिस ने तुरंत उनके हाथ में हथकड़ी पहना दी. पुलिस के कुछ लोग बोल रहे थे कि तुम्हारे पास क्या माल है और बाद में खेत में पानी देने वाली मशीन के पास से पुलिस ने एक पिस्टल बरामद करने की बात कही. पुलिस ने उन्हें इधर ही शूट किया था.”

सालकाटी गांव के रहने वाले 25 साल के इमदादुल का कहना है कि ये पूरी तरह फ़र्ज़ी मुठभेड़ थी.

वे कहते हैं, “पुलिस बोल रही है कि उनके पैर में गोली मारी गई थी. क्या किसी इंसान के पैर में गोली मारने से वो मर सकता है. पुलिस ने मेरे भाई के पैर में दो गोलियां मारीं और एक गोली उनके सीने में मारी गई थी. हमारे पास उनके शव की तस्वीरें हैं. पुलिस ने हमारे साथ अन्याय किया और न्याय के लिए हम अदालत जाएंगे.”

इमदादुल की मानें तो क़रीब छह साल पहले एक बार पुलिस ने जोयनाल को किसी एक मामले में गिरफ़्तार किया था. हालांकि वो मामला क्या था, इस बारे में इमदादुल कुछ नहीं बता पाए.

हिमंत पर योगी स्टाइल में काम करने का आरोप

असल में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद हिमंत बिस्व सरमा ने महज़ दो महीने के भीतर कुछ ऐसे अहम फ़ैसले लिए हैं जिसके आधार पर कई राजनीतिक टिप्पणीकार उनके काम करने के तरीकों को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के काम करने के तरीकों से मिलाकर देख रहे हैं.

मुख्यमंत्री सरमा ने ज़िम्मेदारी संभालते ही राज्य में मंदिरों की भूमि को अतिक्रमण मुक्त करवाने के लिए सबसे पहले दरंग ज़िले में अभियान चलाया. सरकारी कब्ज़े वाली भूमि को खाली कराने के लिए जो अभियान चलाया गया उसके बाद लगभग 200 परिवार (क़रीब 500 से अधिक लोग) बेघर हो गए. बेघर हुए सभी परिवार मुस्लिम समुदाय के थे.

इसके बाद मुख्यमंत्री ने मुसलमानों के 10-12 बच्चे होने को लेकर जनसंख्या ‘विस्फोट’ का मुद्दा उठाया. फिर गायों की सुरक्षा से संबंधित असम मवेशी संरक्षण विधेयक सदन में लेकर आए.

मुख्यमंत्री सरमा ने असम जैसे राज्य में ‘लव जिहाद’ जैसे विषय पर भी मीडिया से बात की. ये वो सारे मुद्दे थे जिसकी ख़बर राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बनी.

इसके अलावा राज्य भर के पुलिस थानों के प्रभारी अधिकारियों के साथ हुई बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा था कि अगर अपराधियों ने हिरासत से भागने का प्रयास किया या ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों से हथियार छीनने की कोशिश की तो उन पर गोली चलाना “पैटर्न” होना चाहिए.

पुलिस हिरासत से अपराधियों के भागने और असम को यूपी की तरह चलाने के सवाल पर न्यूज़ वेबसाइट नॉर्थ ईस्ट नाउ के मुख्य संपादक अनिर्बान रॉय कहते हैं, “असम पुलिस की हिरासत से बीते दो महीने में 50 से अधिक बार अगर अंडर ट्रायल अपराधी के भागने की बात कही जाती है तो ये पुलिस की ही नाकामी को बयां करता है.”

वे कहते हैं, “पुलिस को 50 से अधिक बार अपराधियों पर गोली चलानी पड़ी, इसका मतलब ये हुआ कि असम पुलिस को मालूम नहीं है कि वो अपराधियों को अपनी हिरासत में सुरक्षित कैसे रखे ताकि वो भाग न सकें. ऐसे में असम पुलिस को इस पर अच्छी ट्रेनिंग लेने की ज़रूरत है.”

अनिर्बान रॉय कहते हैं, “अगर पुलिस को लगे कि कोई क़ैदी उनकी हिरासत से भाग सकता है तो उसके दोनों हाथों में पीछे से हथकड़ी लगाई जा सकती है. पुलिस अगर अपनी काम के अंतर्गत स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) का ठीक से पालन करे तो न कोई क़ैदी हिरासत से भाग सकेगा और न ही पुलिस को गोली चलाने की ज़रूरत पड़ेगी.”

अनिर्बान कहते हैं कि पुलिस को कई मामलों में भागने वाले क़ैदी पर गोली चलानी पड़ सकती है, लेकिन इतने कम समय में एक साथ भागने के सभी मामलों में अगर पुलिस गोली चलाने का एक जैसा कारण बताती है तो ऐसी कार्रवाई पर लोग संदेह करेंगे ही.पुलिस एनकाउंटर की प्रतीकात्मक तस्वीर

“यूपी, एमपी, बिहार जैसी राजनीति से असम में बदलाव संभव नहीं”

पिछले दो महीने से जो कुछ बातें सामने आ रही हैं, उसमें कहा जा रहा है कि स्थानीय विधायक अब अपने क्षेत्र के विकास को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों से कुछ नहीं पूछेंगे और विभागीय मंत्री उन्हें इसकी जानकारी देंगे तो ये एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कैसे सही हो सकता है?

क़रीब 20 साल कांग्रेस में रहकर अपनी राजनीतिक ज़मीन तैयार करने वाले हिमंत क्या बीजेपी में अपने इस तरह के फ़ैसलों से ख़ुद को एक हिंदुवादी नेता साबित करने में लगे हैं?

इस सवाल का जवाब देते हुए अनिर्बान कहते हैं, “पुरानी कहावत है, नया-नया मुसलमान ज़्यादा प्याज़ खाता है. एक व्यक्ति (हिमंत) इतने साल कांग्रेस में रहने के बाद भाजपा जैसी पार्टी में शामिल हुए हैं तो उनको ये दिखाना पड़ेगा कि वे एक सच्चे हिंदुवादी नेता हैं. वे अब एक दूसरे डोमेन में आकर ख़ुद को सेटल करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन यहां हिंदी बेल्ट वाली यूपी, मध्य प्रदेश, बिहार जैसी राजनीति लोग स्वीकार नहीं करेंगे. वहां की राजनीतिक संस्कृति को अपनाकर यहां बदलाव लाना संभव नहीं है.”

वे कहते हैं, “असम की राजनीति की गतिशीलता उत्तर प्रदेश से बहुत अलग है. ये राज्य श्रीमंत शंकरदेव और अजान फ़कीर की भूमि है, लिहाज़ा यहां सांप्रदायिक सौहार्द्र बहुत मज़बूत है. मुझे लगता नहीं है कि कोई असम के लोगों को ऐसी बातें करके भड़का सकता है. असम के लोगों में सहनशीलता का स्तर बहुत है. और इस तरह की आक्रामक कार्य शैली उनके लंबे राजनीतिक करियर के लिए ही नुकसानदायक होगी.”

वे कहते हैं, “हिमंत बिस्व सरमा एक अच्छे राजनीतिज्ञ हैं, उन्हें समझना होगा कि यूपी की राजनीतिक स्टाइल असम में ज़्यादा दिन नहीं चल सकती.”ज़ब्त किए ड्रग्स को आग लगाते हिमंत बिस्व सरमा

कांग्रेस का आरोप

असम में लगातार दूसरी बार शासन में आई बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के काम करने के तरीकों को कांग्रेस सर्बानंद सोनोवाल को नाकाम साबित करने से जोड़कर देखती है.

असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता तथा महासचिव अपूर्व कुमार भट्टाचार्य कहते हैं, “सर्बानंद सोनोवाल की सरकार में हिमंत बिस्व सरमा कई प्रमुख विभागों के मंत्री होने के साथ ही सरकार में नंबर टू की हैसियत में थे, लेकिन उस दौरान उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया. क्या उस समय गायों की तस्करी और नशीली दवाओं का कारोबार नहीं चल रहा था? या फिर ये सारे अपराध उनके मुख्यमंत्री बनने के दो महीने के भीतर शुरू हुए हैं.”

भट्टाचार्य कहते हैं, “अब सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद वो इस तरह के फ़ैसले ले रहे हैं, तो क्या बीजेपी की पिछली सरकार नाकाम रही.”

वे कहते हैं, “एक तरह से हिमंत बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद को पूरी तरह बेकार और विफल साबित करना चाहते हैं. इस सरकार पर 90 हज़ार करोड़ रुपये के कर्ज़ का बोझ है और मुख्यमंत्री हिमंत ज़ब्त की गई नशीली दवाओं को जलाने के लिए कई ज़िलों में हेलिकॉप्टर लेकर घूम रहे हैं. क्या सही में एक मुख्यमंत्री को इस तरह के दिखावे की ज़रूरत है?”

बीजेपी का जवाब

क्या सही में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नक्शे क़दम पर चल रहे हैं?

इस सवाल का जवाब देते हुए असम प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा असम वित्तीय निगम के अध्यक्ष विजय गुप्ता कहते हैं, “ऐसा नहीं है कि असम सरकार यूपी सरकार के पैटर्न पर काम करती है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की जहां-जहां सरकारें हैं वे अपनी विचार-पद्धति, सोच और एक निश्चित तरीके से काम करती हैं. इसलिए जो लोग तुलनात्मक बातें करते हैं उन्हें ये लग सकता है कि असम किसी दूसरे राज्य को फ़ॉलो कर रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है.”

वे कहते हैं, “जब विचारधारा एक है, नीति एक है तो काम करने का तरीका भी एक जैसा ही होगा. गाय की तस्करी को रोकना, नशीली दवाओं का धंधा बंद करवाना या फिर समाज में जघन्य अपराध करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना क्या कोई ग़लत काम है. हमारी सरकार शुरू से ही अपराधों के ख़िलाफ़ सख़्ती से निपट रही है और हम एक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर रहे हैं.”

हिमंत ने ‘एनकाउंटर’ पर विधानसभा में क्या कहा?

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने ‘एनकाउंटर’ की इन घटनाओं पर सदन में कहा, “अगर अपराध के ख़िलाफ़ शून्य सहनशीलता की बात नहीं करेंगे तो आने वाले दिनों में मेरे बच्चे भी उस अपराध की बलि चढ़ जाएंगे. जब कोई बलात्कार होता है तो उसमें पीड़ित लड़की को अपनी बेटी की तरह सोचने की क्षमता मुझमें होनी होगी. अगर अपराध हो रहे हैं तो पुलिस को काम करने दीजिए.”

“अगर पुलिस कोई ग़लती करती है तो उसको नियंत्रित करने के लिए न्यायपालिका है. लेकिन अगर पुलिस के ऊपर कोई हमला करता है तो उसके ख़िलाफ़ हमें जवाबी कार्रवाई करनी होगी. सीआरपीसी की धारा 46 पैर फ़ायरिंग की अनुमति देती है.”

“डिमा हसाउ के चरमपंथी और एक-दो घटना जैसे आरपीएफ़ इंस्पेक्टर की घटना को छोड़ दें तो बाकी अपराधियों के पैर पर फ़ायर किया गया है. किसी को भी मारने का प्रयास नहीं किया गया है. मेरे कार्यकाल में गाय की तस्करी से जुड़े कारोबार में 504 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. इन 504 लोगों में किसी को गोली नहीं मारी गई है. अगर असम पुलिस ‘ट्रिगर-हैप्पी’ होती तो 504 लोगों को भी कहीं न कहीं गोली मार देती.”

“ड्रग्स के मामलों में 1,800 से अधिक लोग गिरफ़्तार हुए हैं, लेकिन एनकाउंटर को लेकर धारणा ऐसी बनाई जा रही है जैसे हमने सभी लोगों को गोली मार दी है. मेरे इस कार्यकाल में अबतक 23 लोगों को गोली लगी है इनमें 15 लोग मारे गए हैं उनमें चरमपंथी भी शामिल हैं.”

“मैं पुलिस से कहता हूं,आपको पूरी तरह से ऑपरेशन की लिबर्टी है. असम में गाय की तस्करी रुकनी चाहिए. ड्रग्स का कारोबार बंद होना चाहिए. महिला और बच्चों पर होने वाले अपराध पर लगाम लगनी चाहिए. इसके लिए आपको जो कार्रवाई करनी है, क़ानून के दायरे में रहकर करें. मैं आपसे कुछ नहीं कहूंगा. हम असम पुलिस के साथ खड़े रहेंगे और पुलिस जहां किसी निर्दोष पर कार्रवाई करेगी वहां उनसे सवाल पूछा जाएगा.”

असम के पूर्व पुलिस महानिदेशक जीएम श्रीवास्तव राज्य में सामने आ रही ‘एनकाउंटर’ की घटनाओं पर कहते हैं, “पुलिस परिस्थिति की आवश्यकता के अनुसार काम करती है, लेकिन दूर बैठकर ग्राउंड के बारे में किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं है. क़ानून के भीतर रहकर ही कार्रवाई की जाती है. पुलिस जब कोई कार्रवाई करती है तो ग्राउंड में उस समय जैसी स्थिति का सामना होता है उसी के अनुसार उन्हें निपटना होता है. जब भी चरमपंथी घटनाएं ख़त्म होती हैं तो अपराध बढ़ते हैं. पुलिस की कार्रवाई पर अगर तथाकथित मानवाधिकार वाले सवाल उठाते हैं तो इस सरकार को न तो एके-47 जारी करने की ज़रूरत है और न ही आधुनिक हथियार ख़रीदने की ज़रूरत है.”

हालांकि पुलिस एनकाउंटर की घटनाओं पर राज्य के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने केवल इतना कहा कि ये एक बहुत संवेदनशील मुद्दा है और इस पर वे बात नहीं करना चाहते.

भारतीय क़ानून में ‘एनकाउंटर’

भारतीय संविधान के अंतर्गत ‘एनकाउंटर’ शब्द का कहीं ज़िक्र नहीं है. पुलिस की भाषा में इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब सुरक्षा बल या पुलिस और चरमपंथियों या अपराधियों के बीच हुई भिड़ंत में चरमपंथियों या अपराधियों की मौत हो जाती है.

भारतीय क़ानून में वैसे कहीं भी एनकाउंटर को वैध ठहराने का प्रावधान नहीं है. लेकिन कुछ ऐसे नियम-क़ानून ज़रूर हैं जो पुलिस को ये ताक़त देते हैं कि वो अपराधियों पर हमला कर सकती है और उस दौरान अपराधियों की मौत को सही ठहराया जा सकता है.

आम तौर पर लगभग सभी तरह के एनकाउंटर में पुलिस आत्मरक्षा के दौरान हुई कार्रवाई का ज़िक्र ही करती है. आपराधिक संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 46 कहती है कि अगर कोई अपराधी ख़ुद को गिरफ़्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस की गिरफ़्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है तो उन हालात में पुलिस उस अपराधी पर जवाबी हमला कर सकती है.