-रंगों के उत्सव मतभेद दूर कर पढ़ाता है प्रेम व समरसता का पाठ
झांसी, 17 मार्च (हि.स.)। रंगों के त्यौहार होली को भारत सहित विश्व के तमाम देशों में भी मनाया जाता है। होलिकोत्सव के इस पर्व को विश्व के कोने कोने तक भेजने का श्रेय बुंदेलखंड की पवित्र भूमि को जाता है। इस त्यौहार पर लोग सारे मतभेद भुलाकर एकदूसरे पर रंग व गुलाल डालते हुए प्रेम व समरसता का संदेश देते हैं।
जिस होली के त्यौहार को पूरा देश हर्षोल्लास से मनाता है। इस त्योहार की शुरुआत कहां से हुई यह कम ही लोग जानते हैं। इस त्योहार की शुरुआत बुंदेलखंड स्थित झांसी के कस्बा एरच से हुई। सतयुग में एरच को एरिकच्छ के नाम से विश्व की प्रथम राजधानी के रूप में जानी जाती थी। यह दैत्यराज हिरण्यकश्यप की राजधानी हुआ करती थी। अपने भाई के कहने पर ही यहां पर हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने भक्त प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर जलाने का प्रयास किया था। न जलने के वरदान होने के बाबजूद भी होलिका जल गई थी, जबकि भगवान विष्णु का जाप करते हुए प्रहलाद बच गए थे। कहा जाता है तभी से रंगों के उत्सव होली के पर्व की शुरुआत हुई थी।
80 किमी दूर आज भी मिलते हैं साक्ष्य
झांसी मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर एरच कस्बा स्थित है। ये एरच वही स्थान है, जहां से होली की शुरुआत हुई थी। पुराणों के अनुसार वर्तमान में झांसी जिले का एरच कस्बा सतयुग में एरिकच्छ के नाम से प्रसिद्ध था। यह एरिकच्छ दैत्यराज हिरण्यकश्यप की राजधानी थी। हिरण्यकश्यप को ये वरदान मिला था कि वो न तो दिन में मरेगा और न ही रात में। न उसे इंसान मार पाएगा और न ही जानवर। इसी वरदान को प्राप्त करने के बाद खुद को अमर समझने वाला हिरण्यकश्यप निरंकुश हो गया। वह भगवान विष्णु को अपना परम शत्रु मानता था। वहीं इसके इतर इस राक्षसराज के घर जन्म हुआ भक्त प्रहलाद का। प्रह्लाद की नारायण भक्ति से परेशान होकर हिरण्यकश्यप ने उन्हें मरवाने के कई प्रयास किए। फिर भी प्रहलाद बच गए। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को डिकोली पर्वत से नीचे फिंकवा दिया। डिकोली पर्वत और जिस स्थान पर प्रहलाद गिरे, वो आज भी मौजूद है। उसे प्रह्लाद द्वौ के नाम से जाना जाता है। इसका प्रमाण श्रीमद् भागवत पुराण के 9वें स्कन्ध में मिलता है। झांसी के गजेटियर के पेज 339ए, 357 में भी इसका जिक्र मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को प्रहलाद को मारने की जिम्मेदारी सौंपी थी।
भक्ति की पराकाष्ठा के आगे बौना पड़ा वरदान
कथाओं में आता है कि होलिका के पास एक ऐसी चुनरी थी, जिसे पहनने पर वो आग के बीच बैठ सकती थी। उसे ओढ़ने के बाद उसपर आग का कोई असर नहीं पड़ता था। होलिका वही चुनरी ओढ़ प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई, लेकिन भगवान की भक्ति के आगे उसकी एक न चली। मायावस असर ये हुआ कि हवा चली और चुनरी होलिका के ऊपर से उड़कर प्रहलाद पर आ गई। इस तरह प्रहलाद फिर बच गए और होलिका जल गई। इस पर आक्रोशित हिरण्यकश्यप ने अपने हाथों से प्रह्लाद को मारने के लिए तलवार उठाई और प्रह्लाद पर बार किया। प्रह्लाद को तो कुछ नहीं हुआ बल्कि जिस खम्भे से प्रह्लाद को बंधक बनाया गया था। तलवार लगते ही खम्भा फट गया और उसी खम्भ से विष्णु भगवान ने नरसिंह के रूप में अवतार लिया और गौधुली बेला यानी न दिन न रात में अपने नाखूनों से डिकौली स्थित मंदिर की दहलीज पर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया। तब से लेकर आज तक बुंदेलखंड ही नहीं बल्कि पूरे देश में होली के एक दिन पहले होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है। एरच में आज भी इस परंपरा को स्थानीय निवासी फाग गायन के साथ हर्षोल्लास से मनाते हैं। वहां एरच महोत्सव का भी आयोजन किया जाता है।
बुंदेलखंड में मनाते हैं कुछ इस तरह होली
झांसी समेत पूरे बुंदेलखंड में होलिका दहन के साथ ही होली शुरू हो जाती है। अलग-अलग जगहों पर होली मनाने के अलग अलग तरीके हैं। सामान्यतः बुंदेलखंड में 5 दिनों तक यानी रंग पंचमी तक होली मनाने का रिवाज है। जबकि कुछ स्थानों पर 2 दिन ही होली मनाई जाती है।
धुरेड़ी या कीचड़ की होली
होलिका दहन के तुरंत बाद झांसी समेत बुंदेलखंड में धू रेडी या कीचड़ की होली मनाई जाती है। इसे होलिका दहन के बाद परमा या प्रथमा के दिन मनाया जाता है। लोग कीचड़, गोबर और पानी आदि एक दूसरे पर फेंकते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब विष्णु भगवान ने नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप को मारा। उसके बाद वहां उपद्रव शुरू हो गया और जो होलिका दहन हुआ उसी की राख और कीचड़ आदि से एक दूसरे पर वार किया गया। इसे बाद में धुरेडी या कीचड़ की होली के रूप में मनाया जाने लगा।
प्रेम-स्नेह का प्रतीक रंगों की होली
प्रथमा के दूसरे दिन अर्थात् द्वितीया को रंगों की होली खेली जाती है। इस दिन लोग एक दूसरे को रंग गुलाल लगाकर बुरा न मानो होली है का नारा लगाते हुए एक दूसरे को गले लगाते हैं। सारे गिले शिकवे भुला कर लोग होली खेलते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह होली उस समय खेली गई जब भगवान नरसिंह ने प्रहलाद को राजा बनाते हुए उनका राज्य अभिषेक कर दिया। तब सभी देवता और दानव प्रसन्न होकर एक दूसरे के प्रति मतभेद भुलाकर रंग डाल कर होली खेलने लगे। आज भी लोग मतभेद भुलाकर एक दूसरे को रंग लगाते हुए होली खेलते है विभिन्न रंग हमें समरसता का अहसास भी दिलाते हैं।
त्यौहार पर पकवानों की रहती है धूम
होली के त्यौहार पर घरों में पकवानों की धूम रहती है। इस दिन लोग गुजिया, पपरिया, खस्ता, सेव, खुर्मी व विभिन्न प्रकार की मिठाइयां बनाते हैं। द्वितीया पर लोगों के घरों में बुन्देली व्यंजन समूदी रोटी जिसमें, रोटी, दाल, कड़ी, बरा, मगौरा व कचरिया आदि व्यंजन बनाए जाते हैं।