धान में कीट-रोग का बढ़ा खतरा, खेतों की निगरानी की सलाह

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धमतरी, 12 सितंबर । धमतरी जिले में खरीफ वर्ष 2026 के दौरान करीब 1.39 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती की गई है। वर्तमान में अधिकांश क्षेत्रों में धान की फसल कंसे निकलने से लेकर बालियां आने की अवस्था में है। पिछले दिनों लगातार हुई बारिश और वातावरण में अधिक नमी के कारण धान की फसल में विभिन्न कीट एवं रोगों के प्रकोप की आशंका बढ़ गई है। कृषि विभाग ने किसानों को नियमित रूप से खेतों का भ्रमण कर फसल की निगरानी करने और आर्थिक क्षति स्तर से अधिक प्रकोप दिखाई देने पर अनुशंसित नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी है।

तना छेदक के प्रकोप में पौधे की बीच की कंसे सूखकर डेड हार्ट बन जाती हैं, जबकि बाली अवस्था में बालियां सफेद दिखाई देने लगती हैं। इसके नियंत्रण के लिए कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 प्रतिशत दानेदार 10 किलो प्रति एकड़ अथवा कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 50 प्रतिशत एसपी 400 ग्राम प्रति एकड़ या क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.4 प्रतिशत एससी 60 मिली प्रति एकड़ के उपयोग की सलाह दी गई है। भूरा फुदका पौधे के निचले हिस्से से रस चूसता है, जिससे पौधे सूखने लगते हैं और हॉपर बर्न की स्थिति बन सकती है। इसके नियंत्रण के लिए खेत से अतिरिक्त पानी निकालने और अनुशंसित दवाओं का छिड़काव करने कहा गया है। पत्ता लपेटक कीट पत्तियों को लपेटकर अंदर से खाता है। इसके प्रकोप की स्थिति में क्लोरेंट्रानिलिप्रोल अथवा कारटाप के अनुशंसित उपयोग की सलाह दी गई है। पेनिकल माइट के प्रकोप में बालियां निकलने से पहले ही दानों को नुकसान पहुंचता है। इसके प्रमुख लक्षण बालियों पर भूरे-काले धब्बे, दानों का नहीं भरना और बाली का मुड़ना हैं। इसके नियंत्रण के लिए डायफेथ्यूरॉन 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी 120 ग्राम तथा प्रोपीकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी 200 मिली प्रति एकड़ का छिड़काव किया जा सकता है।

झुलसा रोग से बचाव के लिए यह उपाय अपनाएं:

कृषि विज्ञान केंद्र संबलपुर धमतरी के कृषि वैज्ञानिक डॉ शक्ति वर्मा ने बताया कि ब्लास्ट (झुलसा) रोग से पत्तियों पर आंख के आकार के धब्बे और बाली के गले में काले धब्बे दिखाई देते हैं। इससे बाली टूटने की स्थिति बन सकती है। कृषि विभाग ने इसके नियंत्रण के लिए ट्राइसाइक्लाजोल 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी 120 ग्राम अथवा एजोक्सीस्ट्रोबिन 18.2 प्रतिशत प्लस डाइफेनोकोनाजोल 11.4 प्रतिशत एससी 200 मिली प्रति एकड़ के छिड़काव की सलाह दी है। जीवाणु पत्ता झुलसा रोग में पत्तियां किनारों से पीली होकर सूखने लगती हैं। इसके नियंत्रण के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट प्लस टेट्रासाइक्लिन 60 ग्राम तथा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 500 ग्राम प्रति एकड़ की अनुशंसित मात्रा में छिड़काव करने कहा गया है। साथ ही नाइट्रोजन उर्वरक का अत्यधिक उपयोग नहीं करने की सलाह दी गई है।

कृषि विभाग के उपसंचालक मोनेश साहू ने किसानों को कीटनाशक एवं फफूंदनाशक का छिड़काव सुबह या शाम के समय करने और निर्धारित मात्रा से अधिक दवा का उपयोग नहीं करने कहा है। दवाओं के डिब्बे पर दिए निर्देशों और सुरक्षा सावधानियों का पालन करना जरूरी है। किसी भी दवा का प्रयोग करने से पहले ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी अथवा कृषि वैज्ञानिक से सलाह लेने की अपील की गई है। कीट एवं रोग की पहचान और नियंत्रण संबंधी जानकारी के लिए किसान कॉल सेंटर के टोल-फ्री नंबर 1800-180-1551 पर संपर्क किया जा सकता है।