विशेष रूप से अनुसूचित जाति के किसानों के लिए आयोजित की गई।
कुलपति प्रो. बीआर कम्बोज ने शनिवार काे टिकाऊ कृषि में
औषधीय पौधों के बढ़ते महत्व, उनकी बढ़ती बाजार मांग तथा उन्नत उत्पादन तकनीकों पर प्रकाश
डालते हुए किसानों को अधिक लाभ के लिए इन फसलों को अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने
बताया कि आयुर्वेद केवल रोगों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के समग्र संतुलन—शरीर, मन और प्रकृति—पर आधारित एक प्राचीन
वैज्ञानिक पद्धति है। वात, पित्त, कफ के संतुलन को स्वास्थ्य की कुंजी बताते हुए उन्होंने
कहा कि संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या, योग एवं ध्यान के माध्यम से अनेक बीमारियों
से बचा जा सकता है। साथ ही, औषधीय पौधों के संरक्षण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों
के संतुलित उपयोग पर भी विशेष बल दिया गया। वर्तमान समय में बढ़ते प्रदूषण, तनावपूर्ण
जीवनशैली और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच आयुर्वेद की प्रासंगिकता और अधिक
बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि स्वस्थ व्यक्ति और स्वस्थ पृथ्वी एक-दूसरे के पूरक हैं।
यदि हम प्रकृति का संरक्षण करेंगे, तो हमारा स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहेगा। उन्होंने
सभी से आयुर्वेद आधारित जीवनशैली अपनाने और पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भागीदारी का
आह्वान किया। कुलपति ने कार्यक्रम में प्रकाशनों
एवं औषधीय, सुगंधित एवं संभावित फसल आधारित उत्पादों का भी विमोचन किया। उन्होंने प्रगतिशील
किसानों को भी सम्मानित किया। कार्यक्रम मे वैध सूरज भान ने भी आयुर्वेद पर अपने विचार
व्यक्त किए तथा अपना खानपान और दिनचर्या ठीक करने पर बल दिया।
अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग ने सभी का स्वागत
करते हुए विश्वविद्यालय में चल रही शोध एवं विस्तार गतिविधियों का संक्षिप्त विवरण
प्रस्तुत किया। औषधीय, सुगंधित एवं संभावित फसल अनुभाग के अध्यक्ष डॉ. राजेश आर्य ने
औषधीय, सुगंधित एवं संभावित फसलों पर कविता के माध्यम से अपने विचार साझा किए, वहीं
विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक खेती तकनीकों एवं मूल्य संवर्धन के अवसरों पर विस्तार से जानकारी
दी। प्रशिक्षण कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसानों ने सक्रिय भागीदारी की और विशेषज्ञों
के साथ खेती की विधियों, फसल प्रबंधन एवं आर्थिक संभावनाओं पर चर्चा की गई। किसानों
को कृषि साहित्य, उपकरण, बीज एवं औषधीय पौधों की रोपण सामग्री भी वितरित की गई।