सिख विरोधी दंगों के मामले में कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को आज (मंगलवार को) सजा सुनाई जाएगी। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्हें बुधवार को इस मामले में दोषी ठहराया था। यह मामला 1984 के सिख विरोधी दंगों से संबंधित है, जिसमें सरस्वती विहार के क्षेत्र में दो सिखों, जसवंत सिंह और तरुणदीप सिंह की हत्या की गई थी। गौरतलब है कि सज्जन कुमार के खिलाफ इस मामले के अलावा दिल्ली में तीन अन्य केस भी चल रहे हैं। पूर्व में, दिसंबर 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने उन्हें दंगा भड़काने और हिंसा फैलाने का दोषी पाया था, जिसके चलते उन्हें उम्रकैद की सजा दी गई थी। वर्तमान में, सज्जन कुमार तिहाड़ जेल में अपनी सजा काट रहे हैं।
सज्जन कुमार पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराओं के तहत दंगा, हत्या और डकैती के आरोप लगाए गए हैं। इनमें 147, 149, 148, 302, 308, 323, 395, 397, 427, 436 और 440 शामिल हैं। 1984 में हुई इस जघन्य घटना की शुरुआत 1 नवंबर को हुई थी, जब सरस्वती विहार में दो सिखों की निर्मम हत्या की गई थी। उसी दौरान पंजाबी बाग थाने में सज्जन कुमार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई थी।
16 दिसंबर 2021 को, कोर्ट ने पुलिस जांच के आधार पर सज्जन कुमार और अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए। इस दौरान पीड़ित के वकील ने कहा कि भीड़ ने खतरनाक हथियारों के साथ इलाके में प्रवेश किया और सिखों की प्रॉपर्टीज पर हमला किया। उन्होंने बताया कि जब भीड़ ने जसवंत के घर पर धावा बोला, तब उनकी और उनके बेटे की हत्या कर दी गई और उसके बाद संपत्ति को लूटकर घर में आग लगा दी गई।
फैसले की प्रक्रिया में कई बार परावर्तनों से गुज़रे सज्जन कुमार को सुनवाई के दौरान बार-बार टाले जाने का सामना करना पड़ा। 31 जनवरी 2025 को राउज एवेन्यू कोर्ट ने उनके मामले पर फैसला टाल दिया था। इससे पहले भी 8 जनवरी और 16 दिसंबर 2024 को विशेष न्यायाधीश कावेरी बावेजा की अदालत में वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए उनकी पेशी हुई थी। सज्जन कुमार ने दिसंबर 2021 में कहा था कि वह इस मामले में निर्दोष हैं और वह ट्रायल का सामना करने को तैयार हैं। हालांकि, ट्रायल के संपन्न होने के बाद उन्हें दोषी ठहराया गया और उनके खिलाफ आरोप तय करने का आदेश भी दिया गया था।
इस बीच, वह सुल्तानपुरी दंगा केस में बरी हो चुके हैं, लेकिन 1984 के दंगों में पांच सिखों की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए हैं। यह सुनवाई मामले के सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह घटना पिछले कई दशकों से भारत में सिख समुदाय के प्रति भेदभाव और हिंसा का प्रतीक बन गई है। विभिन्न पक्षों से ऐसी घटनाओं के पीड़ितों का अनुभव सुनना इस मुद्दे की संवेदनशीलता को और भी बढ़ाता है।