हरिद्वार, 20 अक्टूबर । आमतौर पर रामलीला के मंच पर भगवान राम,लक्ष्मण,हनुमान और रावण जैसे पात्रों की भूमिका पुरुष कलाकार निभाते हैं,लेकिन हरिद्वार के शांतिकुंज स्थित देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में इस परंपरा से अलग एक अनूठा प्रयोग देखने को मिला। यहां आयोजित रामलीला में राम से लेकर रावण तक और सीता से लेकर हनुमान तक सभी पात्रों को छात्राओं ने जीवंत किया। विजयादशमी के अवसर पर हुए इस मंचन ने न केवल दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया, बल्कि नारी सामर्थ्य, साहस, त्याग और आत्मविश्वास का संदेश भी दिया।
विश्वविद्यालय परिसर में मंगलवार को आयोजित रामलीला में छात्राओं ने विभिन्न पात्रों के संवाद, भाव-भंगिमाओं और अभिनय के माध्यम से रामायण के प्रसंगों को मंच पर प्रस्तुत किया। नवरात्र साधना के साथ इस प्रस्तुति के लिए अभ्यास कर रही छात्राओं ने अपने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। राम की भूमिका रजनी विश्वकर्मा ने, सीता की भूमिका दीपिका गिरि ने, लक्ष्मण की भूमिका करिश्मा दरवई ने और हनुमान की भूमिका चांदनी ने निभाई। रावण का किरदार भी एक छात्रा ने निभाया।
रामलीला में सभी प्रमुख पात्रों को छात्राओं से निभवाना इस आयोजन की खास विशेषता रही। मंच पर जहां भगवान राम के रूप में मर्यादा और कर्तव्य का संदेश दिखाई दिया, वहीं सीता के चरित्र में धैर्य और आत्मसम्मान तथा हनुमान के अभिनय में साहस और समर्पण की झलक देखने को मिली। रावण के चरित्र के माध्यम से अहंकार और अधर्म के अंत को दर्शाया गया। अंत में रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश दिया गया।
इस आयोजन ने यह भी रेखांकित किया कि कला, संस्कृति और अभिनय के क्षेत्र में प्रतिभा का संबंध किसी एक लिंग तक सीमित नहीं है। अवसर और अभ्यास मिलने पर छात्राएं भी हर तरह के चरित्र को प्रभावी ढंग से मंच पर प्रस्तुत कर सकती हैं। रामलीला के जरिए छात्राओं ने भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया।
गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पंड्या और शैलदीदी ने कहा कि छात्राओं की ओर से रामलीला के सभी पात्रों का निर्वहन नारी सामर्थ्य का सुंदर उदाहरण है। भारतीय संस्कृति में नारी को केवल परिवार ही नहीं,बल्कि समाज निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति माना गया है। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन महिलाओं की प्रतिभा, क्षमता और आत्मविश्वास को अभिव्यक्त करने का अवसर देते हैं।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ.चिन्मय पंड्या ने कहा कि रामलीला का मंचन केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं,बल्कि जीवन में आदर्शों को अपनाने का अवसर है। भगवान राम का चरित्र कर्तव्य, मर्यादा और आदर्श आचरण की प्रेरणा देता है, जबकि रामायण के प्रसंग व्यक्ति को अपने जीवन में नैतिक मूल्यों का महत्व समझाते हैं।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की इस रामलीला में परंपरागत कथा को छात्राओं की भागीदारी के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। मंचन ने सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने के साथ नारी सशक्तीकरण का संदेश भी दिया। विजयादशमी के अवसर पर रावण दहन के माध्यम से यह संदेश उभरा कि समाज में बुराइयों पर विजय पाने के लिए व्यक्ति को अपने भीतर के अहंकार और नकारात्मक प्रवृत्तियों को त्यागना होगा।
