नारायणपुर-बिजली में आदमकद राक्षसों की झांकियां दशहरा के आकर्षण का केंद्र बना

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नारायणपुर, 22 अक्टूबर । छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में दशहरे की परंपरा केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव नहीं, बल्कि ग्रामीण संस्कृति, सामूहिक एकता और पीढ़ियों से चली आ रही कलात्मक विरासत को सहेजने का भी माध्यम है। आज गुरूवार एकादशी को ग्राम बिजली में आयोजित होने वाला बिजली दशहरा महोत्सव इसी अनूठी परंपरा का जीता जागता उदाहरण है।

बिजली गांव के दशहरा में कबाड़ से जुगाड़ कर तैयार की गईं आदमकद राक्षसों की आकर्षक झांकियां, स्थानीय कलाकारों की मनमोहक रामलीला और करीब 30 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन हजारों लोगों के आकर्षण का केंद्र बना। इस वर्ष भी लगभग पांच हजार ग्रामीणों और दर्शकों की मौजूदगी में आयोजित महोत्सव ने एक बार फिर साबित किया कि सीमित संसाधनों के बावजूद ग्रामीणों की मेहनत, कल्पनाशीलता और आपसी सहयोग किसी भी आयोजन को विशेष पहचान दिला सकते हैं।

नारायणपुर जिले के ग्राम बिजली में दशहरा महोत्सव का आयोजन वर्षों से एक विशेष परंपरा के तहत किया जाता रहा है। एकादशी को ग्राम बिजली में इस महोत्सव का आयोजन होता है. पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी उत्साह और सामूहिक सहभागिता के साथ आगे बढ़ रही है। समय के साथ बिजली दशहरे की ख्याति आस-पास के गांवों और पड़ोसी जिलों तक पहुंच चुकी है। बिजली दशहरा महोत्सव में इस वर्ष करीब पांच हजार से अधिक दर्शक पहुंचे। ग्रामीणों की बड़ी भागीदारी के बीच लगभग 25 से 30 फीट ऊंचे रावण के पुतले का निर्माण किया गया था। रामलीला के मंचन और अन्य कार्यक्रमों के बाद रावण वध का प्रतीकात्मक प्रसंग पेश हुआ। इसके बाद रावण के पुतले का दहन किया गया।

मंडली के अध्यक्ष गुलाब चंद बघेल ने बताया कि इस दशहरा में सिर्फ नारायणपुर ही नहीं बल्कि अन्य जिलों से भी लोग आते हैं। हमारे पास भिलाई, राजनांदगांव, बालोद,जगदलपुर और कांकेर जैसे जिलों के लोगों के फोन आते हैं। वो पूछते हैं कि इस बार किस दिन रावण दहन होगा और ग्रामीण झांकी निकालेंगे। मैं बताना चाहूंगा कि इन झाकियों को स्थानीय लोग ही तैयार करते हैं, इसे तैयार करने में करीब 20 से 30 दिन का समय लगता है। लेकिन कलाकारों को अपनी झांकी दिखाने के लिए केवल आधे घंटे का ही समय मिलता है। साथ ही साथ स्थानीय कलाकार मिलकर रामलीला का मंचन करते हैं,इसके बाद रावण दहन का विशाल कार्यक्रम होता है।

बिजली दशहरा महोत्सव की सबसे बड़ी खासियत यहां तैयार की जाने वाली आदमकद राक्षसी झांकियां हैं। इन झांकियों को देखकर दर्शक केवल उनके आकार और रंग-रूप से ही आकर्षित नहीं होते, बल्कि इनके निर्माण के पीछे छिपी मेहनत, हुनर और रचनात्मकता भी लोगों का ध्यान खींचती है। खास बात ये है कि इन कलाकृतियों को तैयार करने के लिए ग्रामीण युवा महंगे संसाधनों पर निर्भर रहने के बजाय कबाड़ में उपलब्ध सामग्री और प्राकृतिक रूप से आसपास मौजूद वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं। महोत्सव के दौरान बिजली पंचायत के कलाकारों ने मंच पर रामलीला का मनमोहक मंचन किया।

जनपद सदस्य राजेश कावले ने बताया कि बिजली गांव में मनाए जाने वाला दशहरा अनोखा है, हम बचपन से इसमें शामिल हो रहे हैं। झांकी बनाने से लेकर रामलीला के मंचन की प्रक्रिया में गांव के बुजुर्गों का अनुभव युवाओं के उत्साह के साथ मिलकर काम करता है। वर्षों से इस परंपरा को देखते और निभाते आ रहे बुजुर्ग अपने अनुभव के आधार पर मार्गदर्शन देते हैं, जबकि युवा और बच्चे अपनी कलाकारी, मेहनत और नए प्रयोगों से झांकियों को आकर्षक रूप प्रदान करते हैं । इस वर्ष भी युवा समूहों की ओर से कुल 10 झांकियां तैयार की गईं, जिन्होंने महोत्सव में पहुंचे दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। बिजली दशहरे की खासियत केवल राक्षसी आकृतियों और रामलीला तक सीमित नहीं है, इस आयोजन में महिलाओं की भागीदारी भी इसकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करती है।