दिल्ली से आए इंफ्लुएंसर्स ने देखी बदलते बस्तर की तस्वीर, आत्मसमर्पित पूर्व नक्सलियों से किया संवाद

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जगदलपुर, 01 अक्टूबर । छत्तीसगढ. के बस्तर भ्रमण के दूसरे दिन गुरुवार काे दिल्ली से आए 43 इंफ्लुएंसर्स ने सुकमा से जगरगुंडा और केरलापेंदा होते हुए पूवर्ती तक का सफर किया। लगभग 13 घंटे से अधिक चले इस सफर में उन्होंने बस्तर की बदलती तस्वीर को करीब से देखा, जो लंबे समय तक देश के सामने नक्सल हिंसा की खबरों के जरिए आया।

इन इंफ्लुएंसर्स ने पुनर्वास केंद्र में मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों से संवाद से लेकर सुरक्षा व्यवस्था को समझने, जगरगुंडा की खूनी सड़क’ से गुजरने, 76 जवानों की शहादत से जुड़े क्षेत्र को देखा। उनका ग्रामीणों से बातचीत करने, 21 साल तक बंद रहे श्रीराम मंदिर में पहुंचने और अंत में पूवर्ती में हिड़मा के परिवार से मिलने तक की यह यात्रा बस्तर के अतीत, वर्तमान और बदलती परिस्थितियों की एक जीवंत तस्वीर बन गई।

सुकमा पहुंचने के बाद इंफ्लुएंसर्स ने सबसे पहले सुकमा पुनर्वास केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने आत्मसमर्पण कर हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों से सीधे संवाद किया। बातचीत में उन्होंने उनके जीवन, आत्मसमर्पण के बाद आए बदलाव और सामान्य जीवन की ओर लौटने के अनुभवों को समझा। इसके बाद इंफ्लुएंसर्स ने सुकमा के पुलिस अधीक्षक से मुलाकात की। उन्होंने क्षेत्र में सुरक्षा, शांति, विकास और प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने के प्रयासों के बारे में जानकारी ली। इस दौरान उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि बस्तर के दूरस्थ और कभी कठिन माने जाने वाले इलाकों तक सुरक्षा के साथ नागरिक सुविधाओं और विकास की पहुंच किस तरह बढ़ रही है।

सुकमा में ही दल ने साइंस पार्क का भ्रमण किया, जंगलों और संघर्ष की छवि से इतर यह पड़ाव बस्तर की उस तस्वीर से परिचित कराने वाला था, जिसमें शिक्षा, विज्ञान और आधुनिक सुविधाओं के लिए भी जगह बन रही है। इसके बाद सफर तोंगपाल की ओर बढ़ा। इसके बाद दल जगरगुंडा के लिए रवाना हुआ। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह मार्ग था, जिसे कभी स्थानीय स्तर पर ‘खूनी सड़क’ के नाम से जाना जाता था।

इसी रास्ते से गुजरते हुए इंफ्लुएंसर्स ने उस दौर की जानकारी ली, जब यह क्षेत्र लंबे समय तक नक्सली हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों का केंद्र रहा। जगरगुंडा पहुंचकर उन्हें उस क्षेत्र के बारे में बताया गया, जो वर्ष 2010 में सुरक्षा बलों के 76 जवानों की शहादत से जुड़े ताड़मेटला हमले की स्मृति से जुड़ा है। 06 अप्रैल 2010 को हुए इस हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों की जान गई थी। यह पड़ाव इंफ्लुएंसर्स के लिए केवल इतिहास जानने का अवसर नहीं था। जिन स्थानों के नाम कभी देशभर में हिंसा की खबरों के साथ सुर्खियों में आते थे, वहां खड़े होकर उस अतीत को समझना उनके लिए बस्तर को एक अलग नजरिए से देखने जैसा था।

जगरगुंडा से आगे बढ़ते हुए इंफ्लुएंसर्स केरलापेंदा पहुंचे। यहां उनका सामना बस्तर की इस बदलती तस्वीर के सबसे मार्मिक प्रतीकों में से एक श्रीराम मंदिर से हुआ। यह वही मंदिर है, जो डर और भय से करीब 21 वर्षों तक बंद रहा था। मंदिर में भगवान श्रीराम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित हैं। वर्ष 2003 में माओवादी प्रभाव के दौर में ग्रामीणों को मंदिर बंद रखने और वहां पूजा-अर्चना न करने का फरमान दिया गया था।

भय का ऐसा वातावरण था कि लोग मंदिर के आस-पास जाने से भी बचते थे। मंदिर में पूजा करीब 21 वर्षों तक बंद रही। फिर अप्रैल 2024 में परिस्थितियां बदलीं। सुरक्षा बलों की मौजूदगी और ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर की सफाई की गई। करीब 21 वर्षों से बंद मंदिर के कपाट फिर खुले। जिस मंदिर के दरवाजे कभी भय के कारण बंद हुए थे, वहां फिर पूजा की घंटियां सुनाई देने लगीं। केरलापेंदा का यह प्रसंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गांव कभी माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। वर्ष 2025 में यहां से 9 सहित कुल 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद केरलापेंदा को माओवादी मुक्त गांव घोषित किया गया था।

इसके बाद इंफ्लुएंसर्स का दल पूवर्ती की ओर रवाना हुआ। जंगलों और दूरस्थ इलाकों से गुजरते हुए कई घंटे की यात्रा के बाद वे रात में पूवर्ती पहुंचे। पूवर्ती नक्सली कमांडर हिड़मा का पैतृक गांव है। यहां इंफ्लुएंसर्स ने हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से संवाद किया। उन्होंने परिवार से गांव की वर्तमान परिस्थितियों, स्थानीय जीवन और क्षेत्र में आए बदलावों के बारे में जानकारी ली। यह मुलाकात इस पूरे सफर का सबसे संवेदनशील पड़ाव रही। एक ओर देश में जिस नाम की पहचान नक्सल हिंसा से जुड़ी रही, वहीं दूसरी ओर उसी व्यक्ति के पैतृक गांव में उसके परिवार के सदस्यों से आमने-सामने बैठकर बातचीत करना बस्तर की जटिल सामाजिक वास्तविकता को समझने का अलग अनुभव था।

बस्तर की कहानी इसलिए जरूरी है कि अब यहां क्या परिवर्तन आया है। उस अतीत से निकलकर आज क्या यहां बदल रहा है। जिन इलाकों की पहचान कभी भय और संघर्ष से होती थी, वहां संवाद की शुरुआत हो रही है, ग्रामीणों और सुरक्षा बलों के बीच संपर्क बढ़ रहा है, विकास की गतिविधियां पहुंच रही हैं और लोगों के जीवन में सामान्यता लौटने के उदाहरण दिखाई दे रहे हैं।