काठमांडू, 19 अगस्त । नेपाल के उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) डॉ. मनोज कुमार शर्मा द्वारा वरिष्ठ न्यायाधीशों को दरकिनार कर कनिष्ठ न्यायाधीशों को संवैधानिक पीठ में शामिल किए जाने के फैसले के विरोध में नेपाल बार एसोसिएशन ने बेंच बहिष्कार की चेतावनी दी है।
संवैधानिक पीठ के गठन में चली आ रही परंपरा के तहत वरिष्ठ न्यायाधीशों को शामिल कर एकरूपता कायम करने की मांग करते हुए बार एसआोशिएशन ने चीफ जस्टिस मनोज शर्मा का ध्यान आकर्षित कराया है। नेपाल बार एसोसिएशन ने प्रधानन्यायाधीश शर्मा को ध्यानाकर्षण पत्र भेजकर संवैधानिक इजलास के लिए दो में से किसी एक प्रक्रिया को अपनाने का सुझाव दिया है।
बार ने वरिष्ठता के आधार पर संवैधानिक पीठ के चार न्यायाधीशों का चयन करने का सुझाव दिया है। यदि ऐसा संभव नहीं हो तो संवैधानिक पीठ के लिए निर्धारित न्यायाधीशों की सूची (रोस्टर) में शामिल न्यायाधीशों का चयन गोला प्रक्रिया के जरिए करने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने संपत्ति जांच बूझ आयोग से संबंधित करीब छह रिट याचिकाओं को संवैधानिक पीठ में भेजने का आदेश दिया है। इन याचिकाओं को संवैधानिक इजलास में पेश किए जाने के बाद चीफ जस्टिस ने चार कनिष्ठ न्यायाधीशों को शामिल कर संवैधानिक पीठ गठन करते हुए सुनवाई करने का निर्णय के बाद बार ने इस पर प्रतिक्रिया दी है।
बार के अध्यक्ष विजय मिश्र ने संकेत दिया था कि यदि सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने अपना निर्णय नहीं बदला तो वे इन मामलों में बहस-पैरवी के लिए जाने के लिए बाध्य नहीं होंगे। हालांकि, इन मामलों की पेशी की तारीख अभी तय नहीं हुई है।
नेपाल के संविधान की धारा 137 में प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में संवैधानिक इजलास के गठन की व्यवस्था की गई है। इसके तहत न्याय परिषद की सिफारिश पर प्रधानन्यायाधीश चार अन्य न्यायाधीशों का चयन करते हैं।
बार का कहना है कि उसने इससे पहले मौखिक रूप से अपनी मांगें रखी थीं, लेकिन उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। बार ने संवैधानिक इजलास के गठन को लेकर कई बार आपत्ति जताई है।
बार ने अपने ध्यानाकर्षण पत्र में कहा है कि अन्य इजलास में विचाराधीन मामलों को भी प्रशासनिक निर्णय के आधार पर संबंधित पक्षों की सहमति और संबंधित पीठ में चर्चा किए बिना संवैधानिक पीठ में भेजे जाने की खबरों से वह और अधिक गंभीर तथा दुखी है।
बार का कहना है कि मामलों की प्रकृति के आधार पर न्यायाधीशों का चयन किए जाने से पीठ की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ सकते हैं। ऐसे पीठ से किसी भी प्रकार का फैसला या आदेश आने पर विभिन्न प्रकार की आशंकाएं और प्रश्न पैदा होते हैं। इसलिए इजलास के चयन के लिए स्पष्ट मापदंड तय कर उसकी विश्वसनीयता कायम की जानी चाहिए।
बार ने तत्काल सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण बैठक बुलाने और उसमें गंभीरता से चर्चा कर वरिष्ठता के आधार पर पीठ गठन की नीति बनाने की मांग की है। बार का स्पष्ट रुख है कि यदि वरिष्ठता के आधार पर न्यायाधीशों का चयन संभव नहीं है तो गोला प्रक्रिया के जरिए न्यायाधीशों का चयन किया जाना चाहिए।
बार ने सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों को भी पत्र की प्रति भेजकर अन्य पीठ में विचाराधीन मामलों को प्रशासनिक निर्णय के जरिए संवैधानिक इजलास में भेजे जाने पर आपत्ति जताई है। बार ने इसे स्थापित परंपरा के विपरीत बताया है।
बार ने अपने बयान में कहा है कि स्थापित मान्यता, अभ्यास और परंपरा के विपरीत होने वाले ऐसे कार्यों से न्यायपालिका की गरिमा, प्रतिष्ठा और जनविश्वास पर गंभीर संकट पैदा हो सकता है। इस विषय में वह पहले भी ध्यानाकर्षण करा चुका है।
बार के अध्यक्ष मिश्रा ने बयान जारी करते हुए कहा है कि यदि चीफ जस्टिस ने संवैधानिक पीठ गठन पर अपने फैसले को नहीं बदला तो इस तरह के पीठ में होने वाली किसी भी मुद्दे की सुनवाई में बार से जुड़ा कोई भी वकील बहस में सहभागी नहीं होगा।