देश में विकसित संस्कृति के विकास से बढ़ा आयकर का दायरा - सरस जनवाद

देश में विकसित संस्कृति के विकास से बढ़ा आयकर का दायरा

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किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था की पहचान उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) या उद्योगों की वृद्धि के साथ ही इस बात से भी होती है कि उसके नागरिक आर्थिक रूप से कितने जागरूक, जिम्मेदार और अनुशासित हैं। आज भारत में आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की लगातार बढ़ती संख्या इसी सकारात्मक परिवर्तन की ओर संकेत कर रही है। निश्चित ही भारतीय जनसंख्या का यह कदम देश में विकसित होती वित्तीय संस्कृति, बढ़ती कर-अनुपालन की भावना और औपचारिक अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ते समाज का प्रतिबिंब है।

आयकर विभाग द्वारा आकलन वर्ष 2026-27 के लिए अब तक 1.7 करोड़ से अधिक आयकर रिटर्न दाखिल होने की जानकारी इस बदलाव का स्पष्ट प्रमाण है, जिसमेंकि एक ही दिन में 10 लाख से अधिक रिटर्न दाखिल किए गए हैं। यह व्यवहार आर्थिक अनुशासन का परिचायक है और विकसित देशों की कर संस्कृति से मेल खाता है।

साथ ही भारत सरकार के उन प्रयासों को भी दर्शाता है, जिसमें कि भारत में पिछले एक दशक के दौरान कर प्रणाली को सरल, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने के लिए व्यापक सुधार किए गए हैं। ई-फाइलिंग पोर्टल, प्री-फिल्ड रिटर्न, आधार-पैन एकीकरण, ऑनलाइन सत्यापन, फेसलेस असेसमेंट और त्वरित रिफंड जैसी व्यवस्थाओं ने करदाताओं की कठिनाइयों को काफी कम किया है। अब आईटीआर दाखिल करना पहले की तुलना में कहीं अधिक सरल, सुरक्षित और सुविधाजनक हो गया है। यही कारण है कि पहले जो लोग आयकर प्रक्रिया से दूरी बनाए रखते थे, वे भी अब औपचारिक कर व्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं।

वस्तुत: आज भारत सरकार द्वारा नए आईटीआर फॉर्म में दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ, शेयर बायबैक से होने वाले नुकसान और कुछ प्रकार के ट्रेडिंग लेनदेन के संबंध में अतिरिक्त जानकारी अनिवार्य किए जाने से यह भी स्पष्ट होता है कि सरकार कर प्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही है। इससे कर चोरी की संभावनाएं कम होंगी और ईमानदार करदाताओं के लिए व्यवस्था अधिक विश्वसनीय बनेगी।

कहना होगा कि आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या में वृद्धि का सीधा प्रभाव प्रत्यक्ष कर संग्रह पर भी दिखाई दे रहा है। वित्त वर्ष 2026-27 की प्रारंभिक अवधि में शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह में 14.64 प्रतिशत और सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह में 12.46 प्रतिशत की वृद्धि यह बताती है कि भारत की अर्थव्यवस्था का औपचारिक दायरा लगातार विस्तृत हो रहा है। प्रत्यक्ष कर किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे स्वस्थ राजस्व स्रोत माने जाते हैं, क्योंकि वे आय और लाभ पर आधारित होते हैं तथा आर्थिक गतिविधियों की वास्तविक स्थिति को भी प्रतिबिंबित करते हैं।

यह परिवर्तन वस्तुत: इस बात का भी प्रमाण है कि भारतीय समाज में वित्तीय साक्षरता भी तेजी से बढ़ी है। डिजिटल बैंकिंग, यूपीआई, ऑनलाइन निवेश, म्यूचुअल फंड, बीमा, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली और पूंजी बाजार में बढ़ती भागीदारी ने नागरिकों को अपनी आय और निवेश का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखने के लिए प्रेरित किया है। आज युवाओं के लिए आयकर रिटर्न भरना केवल कर भुगतान का माध्यम नहीं, बल्कि उनकी वित्तीय पहचान का महत्वपूर्ण दस्तावेज बन चुका है। बैंक ऋण, गृह ऋण, शिक्षा ऋण, वीजा, सरकारी निविदाओं तथा अनेक वित्तीय प्रक्रियाओं में आईटीआर की उपयोगिता लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि अनेक ऐसे लोग भी नियमित रूप से रिटर्न दाखिल कर रहे हैं, जिनकी कर देनदारी सीमित या शून्य है।

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), डिजिटल भुगतान प्रणाली, जनधन-आधार-मोबाइल (जैम) ढांचा, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी), औपचारिक रोजगार में वृद्धि और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार ने भी कर आधार को व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। नकदी आधारित लेनदेन की जगह डिजिटल भुगतान के बढ़ते उपयोग से आर्थिक गतिविधियों का दस्तावेजीकरण मजबूत हुआ है, जिससे कर प्रशासन अधिक प्रभावी बना है।

इस बढ़त के कारण से देश का राजस्व मजबूत हुआ है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इसका सीधा संबंध देश के विकास से है। सरकार को जितना अधिक प्रत्यक्ष कर प्राप्त होगा, उतनी ही अधिक क्षमता उसके पास आधारभूत संरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा, रक्षा, रेलवे, सड़क, सिंचाई, डिजिटल नेटवर्क और सामाजिक कल्याण की योजनाओं में निवेश करने की होगी। करदाता और विकास के बीच यह संबंध जितना मजबूत होगा, राष्ट्र की आर्थिक प्रगति भी उतनी ही स्थायी होगी।

वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तेज आर्थिक विकास के साथ ही जिम्मेदार नागरिक, व्यापक कर आधार और स्वैच्छिक कर अनुपालन भी आवश्यक है। इस दृष्टि से 1.7 करोड़ से अधिक आयकर रिटर्न का समय से पहले दाखिल होना आज भारत की बदलती राष्ट्रीय मानसिकता का संकेत है। यह बताता है कि भारत का नागरिक अब आर्थिक अधिकारों के साथ-साथ अपने आर्थिक दायित्वों के प्रति भी पहले से अधिक सजग हो रहा है।

अब कहना यही होगा कि आयकर का बढ़ता दायरा भारत की बढ़ती आय, विस्तृत होती औपचारिक अर्थव्यवस्था, तकनीक आधारित सुशासन और आर्थिक शिक्षा के प्रसार का सम्मिलित परिणाम है। यह उस भारत की तस्वीर प्रस्तुत करता है, जहां कर भुगतान राष्ट्र निर्माण में साझेदारी के रूप में देखा जाने लगा है। यदि यही प्रवृत्ति आगे भी बनी रही तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति और मजबूत करेगा।