इंदौर, 18 अप्रैल । मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर से जुड़े विवाद मामले में उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने शनिवार को हुई नियमित सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से तीन व्यक्तियों ने नया सिविल सूट दायर किया है। इस याचिका पर युगलपीठ के के समक्ष सुनवाई हुई, लेकिन समयाभाव के कारण कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी। अब मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी।
मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में शनिवार को जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने भोजशाला से जुड़े विवाद मामले में लगी याचिकाओं पर करीब दो घंटे तक सुनवाई की। आपसी सौहार्द के साथ इस मामले का हल निकालने की याचिका पर बहस पूरी हो गई। इसी दौरान इंटरविनर बने धार के नागरिकों द्वारा दायर आपत्ति पर भी पक्ष रखा गया। आपत्तिकर्ताओं ने कहा कि भोजशाला मंदिर है, इसका कोई प्रमाण न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया गया। जो न्यायालय में बताया गया है, उसमें साफ है ये मंदिर नहीं है, ये एक स्कूल (पाठशाला) थी। शाला का मतलब स्कूल होता है न कि कोई मंदिर। सोमवार को भी आपत्तिकर्ताओं की बहस जारी रहेगी।
मुस्लिम पक्ष की ओर से धार भोजशाला परिसर स्थित कमाल मौला मस्जिद कमेटी के अधिवक्ता अशहर वारसी ने पैरवी की। उन्होंने कोर्ट में प्रस्तुत सिविल सूट में भूमि के टाइटल, कब्जे (पजेशन) और धार्मिक अधिकार जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से पक्ष रखा। वारसी ने बताया कि मामले में ‘मेंटेनेबिलिटी’ यानी सिविल सूट की कानूनी स्वीकार्यता पर भी चर्चा आवश्यक है, जिसे न्यायालय के समक्ष स्पष्ट किया गया है।
अधिवक्ता पूर्वी असाटी ने बताया कि अभी कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विस्तृत बहस होना बाकी है। शनिवार की सुनवाई निर्धारित समय समाप्त होने के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। सोमवार को होने वाली सुनवाई में मुस्लिम पक्ष की ओर से सिविल सूट की आवश्यकता, उसके कानूनी आधार तथा धार्मिक एवं वैध अधिकारों से जुड़े तर्क विस्तार से रखे जाएंगे। गौरतलब है कि भूमि संबंधी सिविल मामलों की सुनवाई का अधिकार जिला कोर्ट को होता है। इस विषय से संबंधित एक सिविल सूट धार जिला कोर्ट में पहले से पेंडिंग है, जिस पर 10 मई को सुनवाई प्रस्तावित है।
ऐतिहासिक दस्तावेजों पर सवाल
शनिवार को आपसी सहमति से विवाद समाप्त करने की गुजारिश वाली याचिका पर वरिष्ठ अभिभाषक एके चितले ने पक्ष रखा। उन्होंने लगभग पौन घंटे तक बात रखी। इस दौरान उन्होंने यहां आपसी सहमति से ऐसा रास्ता निकालने की गुजारिश की, जिससे दोनों ही पक्षों में भाईचारा बना रहे। उनके बाद धार के ही रहने वाले जिब्रान अंसारी, फिरोज और अयाज की ओर से दायर आपत्ति पर उनके वकील सैय्यद अशहार अली वारसी ने बात रखना शुरू की। उन्होंने इसको लेकर दायर याचिकाओं पर ही सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने कोर्ट के समक्ष पहले कई दस्तावेज पेश किए, उसके बाद अपनी बात रखना शुरू की।
वाग्देवी की मूर्ति का तर्क
उन्होंने भोजशाला को मंदिर बताए जाने पर आपत्ति ली। उनका कहना था कि ये 700 सालों से मस्जिद है और वहां नमाज हो रही है। वहीं दूसरी ओर इसे मंदिर बताया जा रहा है, जबकि ये मंदिर ही नहीं है। सभी पक्षों ने जो बात रखी है, उसमें इसे स्कूल बताया गया है। स्कूल और मंदिर में अंतर होता है, ऐसे में इसे मंदिर बताते हुए जो दावा लगाया गया है, वो ही गलत है। इसके अलावा उन्होंने कोर्ट में कहा कि इसको संस्कृत स्कूल या मंदिर जिस कागज के आधार पर बताया जा रहा है, वो ब्रिटिश अफसरों का है। इसके साथ ही उन्होंने लंदन म्यूजियम में रखी वाग्देवी की मूर्ति को लेकर तो सीधे याचिका दायर करने वाले हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और अन्य पर सवाल खड़े कर दिए।
पुराने गजट नोटिफिकेशन का हवाला
उन्होंने न्यायालय में कहा कि कोर्ट में ये बात तो रखी गई कि लंदन म्यूजियम में रखी मूर्ति धार से लाई गई थी। लेकिन उसी दस्तावेज में दर्ज इस बात को कोर्ट से छुपाया गया कि ये मूर्ति भोजशाला से नहीं बल्कि सिटी पैलेस से लाई गई थी। सिटी पैलेस और भोजशाला में काफी दूरी है। उन्होंने इस दौरान कोर्ट से तथ्य छुपाने का आरोप भी लगाया। इसके साथ ही उन्होंने 1935 के धार रियासत के गजट नोटिफिकेशन और 1904 के अधिनियम में इस जगह को मस्जिद के रूप में बताए जाने का ऐतिहासिक उल्लेख भी कहा है। उन्होंने इस इमारत को लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के डायरेक्टर द्वारा 1952 में जारी दस्तावेज को भी अदालत में पेश किया, जिसमें उन्होंने उस समय इसको लेकर उठे विवाद के दौरान साफ कहा था कि ये जगह मस्जिद है न कि मंदिर है।
पूजा स्थल अधिनियम 1991
1991 एक्ट के बाद विवाद ही नहीं हो सकता, वहीं उन्होंने 1991 के पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें साफ है कि 1947 में जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था उसी रूप में मान्य होगा। उस समय भी यहां मस्जिद थी और नमाज पढ़ी जा रही थी। इसमें केवल राम जन्मभूमि को ही बाहर रखा गया था, क्योंकि उसका उस समय केस चल रहा था। वहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी उन्होंने कोर्ट में रखे जिसमें अदालत ने अधिनियम के इन प्रावधानों को सही माना था। उन्होंने इस केस को लेकर ही सवाल खड़े कर दिए।
मालिकाना हक और कानूनी फोरम पर सवाल
एक बार वक्फ हमेशा वक्फ, इसके साथ ही उन्होंने वक्फ एक्ट को भी न्यायालय के समक्ष रखते हुए कहा कि एक्ट के मुताबिक कोई संपत्ति एक बार वक्फ घोषित हो जाती है तो वो हमेशा वक्फ ही रहती है। इसको लेकर कोई आपत्ति है तो उसके लिए वे उचित फोरम पर जाएं, वक्फ ट्रिब्यूनल में उसका दावा दाखिल करें। इस जमीन पर हक जताया गया है जो कि गलत है। ये संपत्ति संरक्षित इमारत है और इसका मालिकाना हक फिलहाल एएसआई के पास है। मामला संपत्ति अधिकार का है और इसका अधिकार केवल सिविल कोर्ट को है। इसके लिए इन्हें धार जिला न्यायालय में सिविल सूट दायर करना था। हमने वहां सिविल सूट दायर किया है। इन्हें कोई आपत्ति है तो वहां पर जवाब दाखिल करें। यहां दायर केस का कोई अर्थ नहीं है। ये उचित फोरम पर नहीं जा रहे हैं, केवल कानून का मजाक बना रहे हैं और अदालत का समय बर्बाद कर रहे हैं।
न्यायालय में अभिभाषक वारसी ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के उस दावे को ही गलत ठहराया, जिसमें उन्होंने इस जगह को मंदिर बताया था। उनका कहना था कि इसको लेकर दावे किए गए, प्राचीन किताबों की बात की गई, लेकिन उनकी सत्यता या कानूनी पुष्टि पेश नहीं की गई। बगैर सत्यता के उसे मान्य नहीं किया जा सकता है। वहीं शनिवार को एक बार फिर से जैन समाज की ओर से दायर याचिका जिसमें इस जगह पर दावा किया गया है उसकी ओर से भी वकील पेश हुए। उन्होंने अपनी याचिका पर सरकार द्वारा जवाब पेश नहीं किए जाने की शिकायत की। इसके बाद जब सरकार ने जवाब पेश करने की न्यायालय में जानकारी दी तो उन्होंने अपनी याचिका को भी मुख्य याचिकाओं के साथ सुनने की अपील की। अदालत ने उन्हें भरोसा दिलाया कि सभी पक्षों को सुना जाएगा।