महाकुंभ 2023: यूपी की अर्थव्यवस्था में 2.25 लाख करोड़ का हड़कंप!

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महाकुंभ का आयोजन न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह आर्थिक समृद्धि का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अनुसार, महाकुंभ ने दिखाया है कि किस प्रकार धार्मिक आयोजन और अर्थव्यवस्था का एक साथ विकास संभव है। यह दुनिया की किसी अन्य जगह पर संभव नहीं है कि एक ही आयोजन पर 7,500 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद उससे 3.30 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हो। इस महाकुंभ में 66 करोड़ श्रद्धालुओं ने भाग लिया, जिन्होंने औसतन 5,000 रुपये खर्च किए। इस गणित के हिसाब से कुल खर्च 3.30 लाख करोड़ रुपये के आसपास आता है।

होटल उद्योग ने इस महाकुंभ से सबसे अधिक लाभ कमाया। प्रयागराज में 200 से अधिक होटल, 204 गेस्ट हाउस और 90 से ज्यादा धर्मशालाएं मौजूद हैं। इसके अलावा, 50 हजार से अधिक लोगों ने अपने घरों को होम-स्टे में बदल दिया था। कंफेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र गोयल के अनुसार, होटल उद्योग का कारोबार महाकुंभ से 2,500-3,000 करोड़ रुपये के अनुमान से बढ़कर 40,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। होटल की कीमतें भी अभूतपूर्व रेट पर बिकीं, जैसे 3,000 रुपये वाले कमरे 15,000 रुपये में दिए गए।

दूसरी ओर, महाकुंभ में टोल प्लाजा के जरिए भी बड़ा राजस्व प्राप्त हुआ। प्रयागराज तक पहुंचने के लिए 7 मुख्य मार्ग हैं, प्रत्येक पर टोल प्लाजा मौजूद हैं। टैक्स वसूलने के लिए 70 लाख गाड़ियों ने कुंभ मेले में हिस्सा लिया, जिससे लगभग 300 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को इस मेले से कितना फायदा हुआ है।

महाकुंभ के दौरान खाने-पीने की दुकानों और अन्य व्यवसायों में भी जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई। उदाहरण के लिए, महाराजा कचौड़ी नामक आउटलेट ने मेले में दैनिक आधार पर 8 से 9 हजार प्लेट कचौड़ी बेचकर अद्भुत बिक्री की। इसके अलावा, कई दुकानदार न केवल अपने खर्चों की भरपाई कर पाए, बल्कि उन्हें अपेक्षाकृत अधिक लाभ भी हुआ। कुछ दुकानदारों ने साझा किया कि पहले के मुकाबले कीमतें दोगुनी हो गईं, लेकिन इसके बावजूद भीड़ के चलते बिक्री करने में कोई बाधा नहीं आई।

डेमांड बढ़ने के कारण महाकुंभ के दौरान खाद्य सामग्रियों की आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे कीमतें भी बढ़ गईं। जैसे 20 रुपये की पानी की बोतल अब 30 रुपये में बिकने लगी। इसी प्रकार, पैसेंजर वाहनों के किराए में भी तेजी से वृद्धि हुई, और भीड़ के कारण कई व्यवसायियों ने कीमतों को बढ़ा दिया। महाकुंभ की इस विशेषता ने स्थानीय व्यवसायियों को लाभान्वित किया, जो हमेशा से इस तरह के आयोजनों का इंतजार करते हैं।

इस प्रकार, महाकुंभ न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक इंजन बन चुका है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. प्रशांत घोष ने इसकी महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों का एकत्र होना अपने आप में अद्वितीय है। महाकुंभ का आयोजन, जोकि 7,500 करोड़ रुपये के खर्च में 3 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का निर्माण करता है, यह दर्शाता है कि धार्मिक आयोजनों में आर्थिक संभावनाएं अत्यधिक रचनात्मक हो सकती हैं।