लुधियाना में बंद फ्लॉप: शराब की दुकानें चालू, बस-रेल सेवा बाधित, बाजारों में रौनक!

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सोमवार को किसान संगठनों की ओर से पंजाब बंद के आह्वान के बीच लुधियाना में इस बंद का प्रभाव बहुत ही सीमित नजर आया। जबकि सुबह 7 बजे से शाम 4 बजे तक पूरी तरह से बंद का ऐलान किया गया था, लुधियाना शहर में इसका कोई विशेष असर नहीं दिखाई दिया। शहर के सड़कों पर जहां ट्रैफिक नियमित रूप से चलता रहा, वहीं शराब के ठेके भी खुलकर काम करते रहे। सुबह 9:30 बजे के बाद बाजारों में हलचल भी शुरू हो गई, जिससे यह साफ हो गया कि स्थानीय लोगों में इस बंद के प्रति गंभीरता कम है। विभिन्न स्थानों जैसे घुमार मंडी, चौड़ा बाजार, मॉडल टाउन आदि पर दुकानें खुल गईं और व्यापारी अपना व्यापार करने लगे।

हालांकि पुलिस प्रशासन इस बंद को लेकर पूरी तरह से सतर्क था। लुधियाना के विभिन्न चौराहों पर पुलिस तैनात रही और डीसीपी शुभम अग्रवाल ने सुनिश्चित किया कि शहर में कोई भी हड़ताल या विरोध प्रदर्शन शांति से संपन्न हो। उनके अनुसार, “अगर किसी ने कानून को अपने हाथ में लेने का प्रयास किया, तो उन्हें बख्शा नहीं जाएगा।” उन्होंने यह भी कहा कि किसानों को सरकार के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए ताकि आम जनजीवन असुविधाओं का सामना न करे।

लुधियाना के बस स्टैंड पर यात्रियों की संख्या कुछ अधिक रही लेकिन यात्री निराश नजर आए, क्योंकि निजी और सरकारी बसें वहां खड़ी रहीं। विशेषकर जम्मू जाने वाले यात्रियों ने शिकायत की कि उन्हें सफर करने में काफी कठिनाई हो रही है। मोहम्मद खान और हरजिंदर जैसे यात्रियों ने कहा कि उन्हें अपनी मंजिल तक पहुंचने में समस्याएं आ रही हैं।

सार्वजनिक जीवन पर पड़ने वाले इस प्रभाव का व्यापारियों ने कटु आलोचना की। कई व्यवसायियों ने मीडिया से बात करने से मना कर दिया लेकिन अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि किसान संगठन के विरोध प्रदर्शन अब एक नियमित घटना बन चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि व्यापारियों पर पहले से ही मंदी का असर है और ऐसे में बार-बार बाजार बंद होना उनके लिए काफी परेशानियों का कारण बनता जा रहा है। इसका सीधा असर उनके आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है।

वास्तव में बंद के इस आह्वान के बावजूद, लुधियाना में सामान्य गतिविधियां काफी हद तक सामान्य रहीं। बाजार, फैक्ट्रियां, दुकानें, और अन्य प्रतिष्ठान बिना किसी बड़ी रुकावट के काम करते रहे, जिससे यह संकेत मिलता है कि शहर के लोग अपने जीवन के सामान्य ढंग को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस घटना से यह बात स्पष्ट होती है कि स्थानीय जनसंख्या के बीच किसान आंदोलनों के प्रति एक निश्चित हद तक उदासीनता देखी जा रही है और उन्हें अपने आर्थिक हितों की अधिक चिंता है।