फतेहगढ़ साहिब में 25 दिसंबर से दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह तथा माता गुजरी जी की शहादत को समर्पित तीन दिवसीय शहीदी सभा का आयोजन किया गया है। इस सभा की शुरुआत बुधवार को गुरुद्वारा श्री ज्योति सरूप साहिब में श्री अखंड पाठ साहिब के पाठ के साथ हुई, जिनके भोग 27 दिसंबर को रात्रि में डाले जाएंगे। जैसे ही पौष का महीना आता है, देश-विदेश से संगत यहाँ एकत्र होती है, जिससे पवित्र स्थान पर हर ओर भीड़ हो जाती है। गुरु घरों में माथा टेकने के लिए लंबी कतारें लगी होती हैं और सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए तीन हजार पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं।
फतेहगढ़ साहिब की डिप्टी कमिश्नर डॉ सोना थिंद ने बताया कि शहीदी सभा के पहले दिन, यानी 25 दिसंबर को जिला प्रशासन कंप्लैक्स में सरकार की जनहितकारी योजनाओं और विकास कार्यों से संबंधित एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया जाएगा। इसके अलावा, भाषा विभाग धार्मिक कवि दरबार का आयोजन करेगा, जिसमें विभिन्न प्रसिद्ध कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से साहिबजादों को श्रद्धांजलि देंगे। इस दिन आम खास बाग में एक ऐतिहासिक नाटक भी प्रस्तुत किया जाएगा, जो शहीदों के बलिदान को समर्पित होगा।
27 दिसंबर को अलौकिक नगर कीर्तन का आयोजन किया जाएगा। यह कीर्तन फतेहगढ़ साहिब की पवित्र भूमि पर होगा और इसके अंत में श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार यहाँ उपस्थित सिख समुदाय को एक महत्वपूर्ण संदेश देंगे। यह न केवल श्रद्धांजलि का कार्यक्रम है, बल्कि यह साहिबजादों के बलिदान को याद करने का एक अवसर भी है। हर साल, बड़ी संख्या में संगत यहाँ श्रृद्धांजलि अर्पित करने के लिए एकत्र होते हैं, जो इस पवित्र धरती की महिमा और साहिबों के बलिदान को दर्शाता है।
जिला प्रशासन ने संगत की सुविधा के लिए विशेष इंतजाम किए हैं। संगत की आमद को देखते हुए पास के इलाकों को सील कर दिया गया है, ताकि कोई भी वाहन आगे न जा सके। इसी कारण से बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए 100 बसों और मुफ्त ई-रिक्शा सेवा की व्यवस्था की गई है। इन तीन दिनों के दौरान संगत को बसों और ई-रिक्शा के माध्यम से दर्शन कराए जाएंगे। इस प्रकार के आयोजन न केवल श्रद्धांजलि के रूप में महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यह सिख समुदाय की एकता और धर्म के प्रति उनकी भक्ति का भी प्रतीक है।
फतेहगढ़ साहिब में यह तीन दिवसीय शहीदी सभा श्रद्धा, समर्पण और समर्पण का प्रतीक होगी। संगत को इस पवित्र अवसर पर एकत्रित होकर अपने संतों की शहादत को याद करने का मौका मिलेगा और यह आयोजन न केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह समाजिक एकता को भी दर्शाता है।