बुंदेलखंड में इकलौते कल्पवृक्ष अब आया सुरक्षा के दायरे में 

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बुंदेलखंड में इकलौते कल्पवृक्ष अब आया सुरक्षा के दायरे में 

सर्दी के मौसम में झरने लगती है पत्तियां

हमीरपुर, 24 नवम्बर (हि.स.)। हमीरपुर शहर में यमुना नदी किनारे इकलौते कल्पवृक्ष को अब सुरक्षा के दायरे में कर दिया है। बाढ़ के दौरान यमुना नदी की कटान से यह एतिहासिक वृक्ष अब जल्द ही सुरक्षित रहेगा। डिपार्टमेंट ने शमशान घाट से लेकर कल्पवृक्ष होते हुए पतालेश्वर मंदिर तक नदी किनारे तटबंध को पूरी तरह से इंटरलाकिंग कराया है। साथ ही पथवें की भी तस्वीर बदली है जिससे सुबह की पहर में घूमने वालों को कल्पवृक्ष के दर्शन मिलेंगे।

हमीरपुर शहर के बीचोंबीच यमुना नदी के कगार पर कल्पवृक्ष सदियां बीतने के बाद आज भी खड़ा है। यह वृक्ष बुंदेलखंड और आसपास के इलाकों में इकलौता है जिसके अतीत में कम से कम एक हजार साल का पुराना इतिहास छिपा है। यह वृक्ष भी बड़ा ही बिलक्षण है जो पूरे हमीरपुर शहर के आम लोगों के लिए आस्था का प्रतीक है। इस वृक्ष को शहर की आधी आबादी प्रतिदिन पूजा अर्चना करने आती है। त्योहारों में तो यहां कल्पवृक्ष के नीचे हमीरपुर, महोबा और कानपुर से तमाम लोग डेरा डालकर विशेष अनुष्ठान करते है। प्रत्येक एकादशी के दिन कल्पवृक्ष स्थल पर पूजन करने वाली महिलाओं का मेला लगता है। मौदहा बांध निर्माण खंड ने शमशान घाट से कल्पवृक्ष स्थल तक यमुना नदी किनारे इंटरलाकिंग कर इस पुराणिक वृक्ष को सुरक्षा के दायरे में कर दिया है। इसके साथ ही वाक पथ की तस्वीर भी बदले जाने से सुबह और शाम को घूमने वाले स्थानीय लोगों में खुशी देखी जा रही है। राजेश सिंह, समाजसेवी ज्ञानेन्द्र अवस्थी उर्फ गांधी व अशोक निषाद समेत तमाम लोगों ने बताया कि इंटरलाकिंग और वाक पथ बन जाने से अब यह एतिहासिक वृक्ष सुरक्षित हो गया है। वन विभाग के डीएफओ एके श्रीवास्तव के मुताबिक यह वृक्ष कम से कम एक हजार साल पुराना है। इसकी ऊंचाई करीब बत्तीस फीट है वहीं इसका तना करीब बीस फीट है। यह वृक्ष बुंदेलखंड का एकलौता वृक्ष है।

सर्दी के मौसम में कल्पवृक्ष में झरने लगती है पत्तियां

पौराणिक कल्पवृक्ष सर्दी के मौसम में सूखने लगता है। इसरी पत्तियां भी अब धीरे-धीरे झरने लगी है। एक सौ पांच साल वर्षीय विजय कुमारी व कैलाश वती ने बताया कि भयंकर सर्दी में कल्पवृक्ष पूरी तरह से सूख जाता है। लेकिन जैसे ही गर्मी शुरू होती है तो इसमें पत्तियां आने लगती है। बुजुर्ग बाबूराम प्रकाश त्रिपाठी ने बताया कि भीषण गर्मी में यह वृक्ष हरा भरा रहता है। इसमें बड़े-बड़े फूल भी खिलते है जो देखने में बड़े ही सुन्दर लगते है। इसमें फल भी आते है। लेकिन फल में बीज नहीं होता है। स्थानीय लोग फूल और फल औषधि के रूप में प्रयोग करने के लिए घर ले जाते है। लोग घरों में कल्पवृक्ष की पत्तियों का प्रयोग चाय में करते है।

कल्पवृक्ष के अतीत में छिपा सदियों पुराना इतिहास

हमीरपुर के पंडित दिनेश दुबे ने बताया कि पुराणों में कल्पवृक्ष का सुन्दर उल्लेख मिलता है। इन्द्रदेव के उद्यान में कल्पवृक्ष लगा था जिसे सत्यभामा के कहने पर श्रीकृष्ण इस लोक पर लाए थे। यह बड़ा ही दुर्लभ वृक्ष है जिसकी पूजा और परिक्रमा करने मात्र से ही मन को बड़ी शांति मिलती है। आयुर्वेद चिकित्सक डाँ.दिलीप त्रिपाठी ने बताया कि हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों को इस वृक्ष के नीचे बैठने मात्र से आराम मिल जाता है। यहां के सतीश तिवारी, लक्ष्मीकांत त्रिपाठी व पंडित सुरेश मिश्रा ने बताया कि इस वृक्ष केनीचे खोह में एक संत ने कई सालों तक तपस्या की थी। इस वृक्ष की विधि विधान से पूजा करने से मनोकामना भी पूरी होती है।

करोड़ों रुपये खर्च कर वृक्ष के पास कराई गई पिचिंग

यमुना नदी किनारे स्थित सदियों पुराने कल्पवृक्ष को यमुना नदी की बाढ़ की कटान से बचाने के लिए मौदहा निर्माण खंड हमीरपुर ने कई साल पहले दस करोड़ रुपये की लागत से कार्य कराए थे। तटबंध में मिटट्ी डलवाकर उसमें बोल्डर पत्थर लगाए गए है। और तो और कच्चे तटबंध को पक्का कराकर इंटरलाकिंग भी कराई गई है। फिर भी कल्पवृक्ष के पास जमीन में गहरी दरारें आ गई है। मौदहा बांध निर्माण खंड ने ए. ए., सी.सी.बंध जोडऩे की 6.40 करोड़ परियोजना तैयार की थी जिसके सभी कार्य कराए गए है। साथ ही शमशान घाट के पास पुल भी बनाया गया है। करोडों खर्च के बाद भी पौराणिक कल्पवृक्ष स्थल का अभी विकास भी नही हो सका।

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