दाल-रोटी के नेपथ्य में जाने के खतरे

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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस की हालिया रिपोर्ट में रहन-सहन और खान-पान के प्रति देशवासियों में जबरदस्त बदलाव सामने आया है। जहां एक ओर 1999-00 से 2022-23 के दौरान खाने-पीने की वस्तुओं पर खर्च में तेजी से कमी देखी जा रही है, वहीं खाने-पीने से इतर अन्य पर खर्च में बड़ा उछाल सामने आ रहा है। मजे की बात यह है कि यह बदलाव केवल शहरी क्षेत्रों में हो, ऐसा नहीं हैं अपितु ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव की बयार लगभग समान ही नहीं अपितु शहरी क्षेत्र से अधिक ही है। ऐसा नहीं है कि इस दौरान प्रति व्यक्ति व्यय में कमी आई हो अपितु प्रति व्यक्ति व्यय में लगातार बढ़ोतरी ही देखने को मिल रही है। यह रुझान तेजी से बदलती प्राथमिकताओं को भी स्पष्ट करता है। मजे की बात यह है कि खाद्यान्न (सिरियल्स) के उपयोग में कमी आई हैं वहीं अखाद्य सामग्री की खरीद में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।

दरअसल यह बदलाव बदलते परिदृश्य को भी स्पष्ट करता है। इस रिपोर्ट का विश्लेषण किया जाए तो खाने-पीने की वस्तुओं में चाहे शहरी क्षेत्र हो या ग्रामीण दोनों ही जगह ब्रेवरेज यानी की पेय पदार्थाें और प्रोसेस्ड फूड यानी की डिब्बा बंद खाद्य पदार्थोें का उपयोग बढ़ा है। इन्हें भी शामिल कर लिया जाए तो भी खान-पान पर होने वाला व्यय 1999-00 की तुलना में 2022-23 आते-आते बहुत कम हो गया है वहीं अखाद्य वस्तुओं पर शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों द्वारा दिल खोलकर पैसा खर्च किया जा रहा है।

लगता है जैसे अब लोगों की समान रूप से प्राथमिकताएं बदल गई हैं। बल्कि यह कहना अधिक युक्तिसंगत होगा कि अब रहन-सहन और सुख-सुविधाओं के उपयोग में गांव किसी तरह से भी शहरों से पीछे नहीं रह रहे है। बल्कि रिपोर्ट से तो यही उभर कर आता है कि मॉल संस्कृति के बावजूद अब उत्पादकों को ग्रामीण क्षेत्र में अच्छा बाजार मिलने लगा है। इसे अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत भी माना जा सकता है। सर्वे से स्पष्ट हो रहा है कि अब गांव, गांव नहीं रहे। वह शहरों से कहीं पीछे नहीं रहना चाहते। यही कारण है कि उत्पादकों द्वारा अब ग्रामीण क्षेत्र को भी टारगेट बनाकर रणनीति तैयार की जाने लगी है।

देश में दो दशक में ही आए इस बदलाव को आंकड़ों की भाषा में समझें तो ग्रामीण क्षेत्र में 1999-00 में खाद्य सामग्री पर 59.40 प्रतिशत राशि व्यय की जा रही थी, वहीं 2022-23 आते-आते यह घटकर 46.38 प्रतिशत ही रह गई। खास बात यह कि इसमें तेजी से बदलाव खासतौर से पिछले एक दशक में देखा गया है। इसी तरह से शहरी क्षेत्र की बात की जाए तो 1999-00 में खाद्यान्न पर 48.06 प्रतिशत राशि खर्च की जाती थी जो 2022-23 में 39.17 प्रतिशत रह गई। सबसे खास बात यह कि सिरियल्स में जो कमी आई है भले ही उसके पीछे विशेषज्ञ एक कारण सरकार द्वारा खाद्य सामग्री का निःशुल्क व कम कीमत पर वितरण मान रहे हैं पर यह गले उतरने वाली बात इसलिए नहीं है कि खाद्य सुरक्षा के तहत एक सीमा तक ही निःशुल्क खाद्य सामग्री का वितरण हो रहा है।

हां, कुछ हद तक खाने-पीने के बदलाव की बात कही जाती है पर यह भी सही नहीं मानी जा सकती क्योंकि डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों के उपयोग में उतनी बढ़ोतरी नहीं दिख रही जितनी सिरियल्स के उपयोग में कमी आई है। लगता है जैसे सिरियल्स से लोगों का मोहभंग होता जा रहा है, पर इसे भविष्य के लिए शुभ संकेत भी नहीं माना जा सकता। 1999-00 में ग्रामीण क्षेत्र में सिरियल्स व सिरियल्स सबस्ट्यिूट पर 22.23 प्रतिशत राशि व्यय होती थी जो दो दशक में ही कम होते-होते इकाई की संख्या यानी कि 6.92 प्रतिशत पर आ गई है। यह तो गांवों की स्थिति है। शहरों में भी सिरियल्स व सिरियल्स सबस्ट्यिूट पर होने वाला व्यय 12.39 से कम होकर 4.51 प्रतिशत रह गया है। दूसरी और खाद्य सामग्री में ही ब्रेवरेज और प्रोसेस्ड फूड को लिया जाए तो इसका उपयोग शहरी क्षेत्र में 6.35 प्रतिशत से बढ़कर 10.64 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्र में 4.19 प्रतिशत से बढ़़कर 9.62 प्रतिशत हो गया है। दूसरी और अखाद्य वस्तुओं की खरीद की बात की जाए तो ग्रामीण क्षेत्र में 40.60 प्रतिशत से बढ़कर 53.62 प्रतिशत हो गई तो शहरी क्षेत्र में 51.94 प्रतिशत से बढ़कर 60.83 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसमें भी ज्यादा उछाल डूरेबल आइटम्स में देखा जा रहा है। लोगों की रुचि वाहन, एसी, फ्रीज, ओवन, फ्लेट्स या मकान आदि की और रुझान बढ़ा है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि कपड़े-जूते और इसी तरह की निजी उपयोग की वस्तुओं पर व्यय में कमी आई है।

दरअसल यह दो दशक में देशवासियों के बदलते मिजाज की तस्वीर है। पर खाने-पीने की वस्तुओं के उपयोग में कमी आना, डिब्बाबंद व पेयपदार्थों के उपयोग में बढ़ोतरी चिंता का विषय होनी चाहिए। इसी तरह से डूरेबल आइटम्स के लिए जिस तरह से पर्सनल और अन्य तरह के लोन लेने व क्रेडिट कार्ड के उपयोग के कारण कर्ज के बोझ तले दबने को भी उचित नहीं कहा जा सकता। देखा जाए तो इनसे आज की पीढ़ी व आज के लोग तनाव, कुंठा, प्रतिस्पर्धा आदि को भी बिना किसी तरह का दाम चुकाए प्राप्त करने लगे है। एक समय था जब दो टाइम की दाल-रोटी पहली आवश्यकता व प्राथमिकता होती थी वह दो दशक में ही नेपथ्य में चली गई लगती है। सर्वे से यह तो साफ हो गया है कि आज ग्रामीण और शहरी क्षेत्र लगभग एक रफ्तार से एक ही दिशा में बढ़ रहे हैं और गांव और शहर का भेद कम हो रहा है पर खाने-पीने की आदतों में बदलाव भविष्य की चिंता का कारण बन सकता है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)