सम्मान-मुकाम: भटकाव से शिखर पर ले जाने वाले कलमकार थे कमलेश्वर

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जन्मतिथि पर विशेष

– इतिहास और समय की दस्तक है ‘कितने पाकिस्तान’

– रूके न थके, ताउम्र लिखते रहे, ऐसे लेखक थे कमलेश्वर

– बेशुमार रंगों में जीने वाले कमलेश्वर ने दूरदर्शन को दी थी ऊंचाई

– पाकिस्तान तक है भारतीय हिंदी लेखक कमलेश्वर की पहचान

(हि.स.)छुटपन का हमारा संडे किसी बेतकलुफ्फ शायर सा होता था। कोई घिसा-पिटा रूटीन नहीं, जब जी चाहा टीवी खोलकर जम जाओ। पता नहीं आपको याद है या नहीं,पर तब के दूरदर्शन राज में रविवार सुबह एक सीरियल आया करता था ‘चंद्रकांता’। क्या बच्चे क्या बड़े सब उसके दीवाने थे। उस सीरियल को लिखने वाले थे ‘कमलेश्वर’ पूरा नाम कहें तो ‘कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना’। मशहूर साहित्यकार और संपादक कमलेश्वर का नाम तो आज की पीढ़ी ने सुना है, पर उनके बारे में शायद वे ज्यादा नहीं जानती होगी। चलिए अब हिन्दुस्थान समाचार बताएगा कमलेश्वर के बारे में काफी रुचिकर बातें।

कमलेश्वर के कई रूप थे। पूरी तरह बेखौफ होकर फिरकापरस्ती,जहरीले जातिवाद और सामाजिक-मनोवैज्ञानिक सूक्ष्म समझ रखने वाले साहित्यकार, निष्पक्ष और जनपक्षीय प्रगतिशील संपादक,पत्रकार। दक्ष फिल्म स्क्रिप्ट राइटर। अपनी बुलंद आवाज में श्रोताओं को जकड़ लेने वाली कॉमेंट्री करने वाले कॉमेंटेटर। दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक। कई साहित्यिक आंदोलनों की अगुवाई करने वाले। जनसरोकारों को जनवादी सांचों के साथ साप्ताहिक दूरदर्शन कार्यक्रम ‘परिक्रमा’ में प्रस्तुत करके लाखों दर्शकों को तार्किक संवेदनशीलता के साथ सोचने के लिए मजबूर करने वाले ‘कितने पाकिस्तान’ सरीखे हस्तक्षेपकारी तथा अब तक सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले उपन्यास के लेखक कमलेश्वर।

कमलेश्वर की ‘कितने पाकिस्तान’ उनकी कालजयी रचना है। बुद्धिजीवियों, चिंतको की मानें तो कमलेश्वर ने महज ‘कितने पाकिस्तान’ नहीं बल्कि एक महागाथा रची थी,जिसमें हर व्यक्ति एक कटघरे में खड़ा है और उसे ही निर्णय भी देना है,कौन बड़ा? हिंदू, मुस्लिम,सिख,ईसाई के बीच की तनातनी,नफरत-भाईचारे और दोस्ती में छिपा प्रेम! हमारी मिट्टी के टुकड़े क्यों हुए,किसने किए? कमलेश्वर ने इस उपन्यास के जरिए सबसे सवाल किए और जवाब तलाशने को सबको छोड़ भी दिया। कमलेश्वर की लेखन शैली का एक और मजेदार रंग है और वो है हास्य-व्यंग्य।

कमलेश्वर ने अपने जीवनकाल में 99 फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी,हालांकि वो सौ फिल्में करना चाहते थे लेकिन सेहत ने साथ नहीं दिया। आंधी,अमानुष, मिस्टर नटवरलाल उनकी लिखी कुछ सफल फिल्मों में हैं। दूरदर्शन को उन्होंने एक नई ऊंचाई दी। चंद्रकांता के अलावा युग और बेताल-पच्चीसी घर-घर देखे जाने वाले धारावाहिक थे। कमलेश्वर ताउम्र लिखते रहे,कभी थके नहीं,रुके नहीं। वर्ष 2007 में वो इस दुनिया को अलविदा कह दूसरे सफर पर निकल गए,पर उनके इस सफर की कतरनें जोड़ने वाले जोड़ ही लेते हैं जैसे अब हम और आप साथ-साथ जोड़ रहे हैं। इन जैसे कथाकारों से ही महफिल गुलजार है और हमेशा रहेगी।

वर्ष 1990 में कमलेश्वर ने ‘कितने पाकिस्तान’ लिखना शुरू किया था और 1999 में खत्म किया। उनके शब्दों में कहें तो ‘खत्म’ तो यह आज भी नहीं हुआ। जाहिरन उपन्यास के लेखन का प्रारंभ जब किया गया तब असहिष्णुता चरम पर थी और चैन की जिंदगी गुजर-बसर करने वाला हर शख्स दिल और दिमाग से खौफजदा था। उन्हीं वर्षों में बाबरी विध्वंस हुआ था और बर्बर सांप्रदायिक दंगों का अनवरत सिलसिला परवान चढ़ा था। इन्हीं के बीच ‘कितने पाकिस्तान’ का लिखा जाना चलता रहा। कई पड़ाव लांघ कर यह उपन्यास जब सामने आया तो हिंदी साहित्य के अधिकतर बड़े एवं मठाधीश आलोचकों ने इसे लगभग खारिज कर दिया। स्वयंभू आलोचकों ने भी इसे असफल रचना का सर्टिफिकेट देते हुए कहा कि पाठक इसके करीब भी नहीं गुजरेंगे। सबको धता मिली। व्यापक हिंदी पाठक वर्ग ने रफ्ता-रफ्ता कितने पाकिस्तान को हाथों-हाथ लेना शुरू किया और यह सिलसिला बदस्तूर जारी है।

इलाहाबाद, दिल्ली और मुंबई थे कामकाजी ठिकाने

छह जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में जन्मे कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना कब ‘कमलेश्वर’ बने, किसी को पता नहीं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जिसे कभी हिंदुस्तान का ऑक्सफोर्ड कहा जाता था और जिसने राजनीति, समाज विज्ञान,पत्रकारिता और साहित्य को कई हस्तियां दी उसी विश्वविद्यालय में कमलेश्वर ने हिंदी साहित्य में एमए की और संभवतः यहीं से वह ‘कमलेश्वर’ हुए जिन्हें हम दिग्गज भारतीय लेखक के तौर पर जानते हैं। इलाहाबाद,दिल्ली और मुंबई मुख्य तौर पर कमलेश्वर के कामकाजी ठिकाने रहे। बेशक सृजनात्मक लेखन के लिए उन्हें पहाड़ी तथा जंगली डाक बंगले खूब भाते थे। डाक बंगला उनके एक उपन्यास का शीर्षक भी है। उन्होंने तीसरा आदमी, समुंदर में खोया हुआ आदमी,काली आंधी,आगामी अतीत, सुबह दोपहर शाम, रेगिस्तान,लौटे हुए मुसाफिर और एक और चंद्रकांता इत्यादि उपन्यास लिखे।

‘साहित्यिक आंदोलनजीवी’

कमलेश्वर की अदबी दुनिया में शुरुआती शिनाख्त कहानी लेखक की है। 300 के करीब कहानियां उन्होंने लिखीं। राजा निरबंसिया,सांस का दरिया,नीली झील,बयान,नागमणि,अपना एकांत,जॉर्ज पंचम की नाक,मुर्दों की दुनिया, नागमणि,कस्बे का आदमी,खोई हुई दिशाएं और स्मारक आदि उनकी बहुप्रसिद्ध कहानियां हैं तथा उनके कई कथा संग्रहों के शीर्षक भी इन्हीं कहानियों में से लिए गए हैं। कई कथा आंदोलनों का समय-समय पर उन्होंने नेतृत्व किया। इन मायनों में वह ‘साहित्यिक आंदोलनजीवी’ थे।

कौन थे कमलेश्वर

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे कमलेश्वर अपने समय के बहुत बड़े कथाकार थे। 1932 में जन्मे कमलेश्वर हिंदी के जाने-माने साहित्यकार थे। 75 साल की उम्र में 27 जनवरी, 2007 में उनका निधन हो गया। आंधी, मौसम, रजनीगंधा, छोटी सी बात,रंग बिरंगी और द बर्निंग ट्रेन जैसी कई फिल्मों की कहानियां उन्होंने लिखी थीं। उन्होंने सैकड़ों कहानियां लिखीं, करीब दर्जन भर उपन्यास रचे, सीरियल-फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी। ‘कितने पाकिस्तान’ उनकी सबसे चर्चित किताब है। कमलेश्वर की लेखन यात्रा उनकी पढ़ाई के दौरान ही शुरू को गई थी। उन्हें उपन्यास, कहानियों और फिल्मी पटकथाओं के लिए याद किया जाता है। उन्हें साहित्य अकादमी अवॉर्ड और पद्मभूषण सम्मान दिया गया है।