11HLEG14 शाही ईदगाह मस्जिद को कृष्ण जन्मभूमि के रूप में मान्यता देने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज
प्रयागराज, 11 अक्टूबर (हि.स.)। इलाहाबाद हाईकोर्ट से कृष्ण जन्मभूमि पक्ष को झटका लगा है। कोर्ट ने मथुरा स्थित शाही ईदगाह मस्जिद स्थल को कृष्ण जन्मभूमि के रूप में मान्यता देने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है।
यह आदेश मुख्य न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर और न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की खंडपीठ ने महक महेश्वरी की ओर से दाखिल जनहित याचिका को खारिज करते हुए दिया है। कोर्ट ने इस मामले में चार सितंबर को अंतिम सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था।
याची की ओर से दलील दी गई थी कि विचाराधीन स्थल कृष्ण जन्मभूमि स्थल है। मथुरा का इतिहास रामायण काल से भी पहले का है और इस्लाम मात्र 1500 साल पहले आया था। इसके अलावा इस्लामिक न्यायशास्त्र के अनुसार यह एक उचित मस्जिद नहीं है क्योंकि, जबरन अधिग्रहीत भूमि पर मस्जिद नहीं बनाई जा सकती है और हिंदू न्यायशास्त्र के अनुसार वह एक मंदिर है। भले ही वह खंडहर हो। इसलिए यह जमीन हिंदुओं को सौंप दी जाए और उस भूमि पर मंदिर बनाने के लिए कृष्ण जन्मभूमि जन्मस्थान के लिए एक ट्रस्ट बनाया जाए। याचिका में शाही ईदगाह स्थल की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा अदालत की निगरानी में जीपीआरएस आधारित खुदाई की मांग भी की गई थी।
याचिका में कहा गया था कि भगवान कृष्ण का जन्म राजा कंस के कारागार में हुआ था, जो शाही ईदगाह ट्रस्ट द्वारा निर्मित वर्तमान संरचना के नीचे है। याचियों की ओर से यह भी कहा गया कि 1968 में सोसायटी श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ ने ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह की प्रबंधन समिति के साथ एक समझौता किया, जिसमें भगवान की संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा बाद में दे दिया गया।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है और इसलिए विवादित भूमि को अनुच्छेद 25 के तहत धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, अभ्यास करने और प्रचार करने के उनके अधिकार के प्रयोग के लिए हिंदुओं को सौंप दिया जाना चाहिए।
याचिका में अदालत से पूजा स्थल अधिनियम 1991 की धारा दो, तीन और चार को असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने का आग्रह किया गया। कहा गया कि ये प्रावधान उस लंबित कार्रवाई को खत्म कर देते हैं, जिसमें 15 अगस्त 1947 से पहले कार्रवाई का कारण उत्पन्न हुआ था। यह भी कहा गया कि यह प्रावधान हिंदू कानून के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं। क्योंकि, मंदिर की संपत्ति कभी नहीं खोती है, भले ही अजनबियों द्वारा इसका आनंद लिया जाए और यहां तक कि राजा भी सम्पत्ति नहीं छीन सकता है। क्योंकि, देवता या भगवान अवतार हैं और एक न्यायिक शक्ति हैं। कालातीत और इसे समय की सीमाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता।