सागर: ग्रंथपाल को एडी का प्रभार, वरिष्ठ प्राचार्यों ने पूछा- नियमों की सीढ़ी लांघकर कैसे मिली जिम्मेदारी?

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प्राचार्यों द्वारा प्रमुख सचिव को भेजे पत्र में मूल प्रश्न यही उठाया गया है कि अतिरिक्त संचालक पद का प्रभार किसी भी अधिकारी को सौंपने के लिए क्या स्पष्ट पात्रता और संवर्ग निर्धारित है और यदि है तो वर्तमान व्यवस्था में उसका पालन हुआ या नहीं। पत्र के अनुसार अतिरिक्त संचालक का पद संभाग स्तर पर उच्च शिक्षा विभाग की महत्वपूर्ण प्रशासनिक कड़ी है। इसके अंतर्गत शासकीय महाविद्यालयों से जुड़े शैक्षणिक, प्रशासनिक, वित्तीय तथा विभागीय कार्यों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी रहती है।

ऐसे में प्राचार्यों का कहना है कि किसी कर्मचारी का महाविद्यालय में कार्यरत होना अपने आप उसे दूसरे संवर्ग के उच्च प्रशासनिक पद का पात्र नहीं बना सकता। पद का स्वीकृत संवर्ग, सेवा नियम, निर्धारित पात्रता और वरिष्ठता क्रम देखना आवश्यक है। इसी आधार पर उन्होंने वर्तमान प्रभार आदेश की प्रक्रिया और वैधानिकता की जांच की मांग की है।

प्राचार्यों ने अपने पत्र में वर्ष 2022 के शासनादेश का भी उल्लेख किया है। उनका दावा है कि प्रभारी प्राचार्य की नियुक्ति के संबंध में वरिष्ठ प्राध्यापक को प्राथमिकता दिए जाने का प्रावधान शासनादेश में मौजूद है। इसी के साथ मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के एक आदेश का हवाला देते हुए वरिष्ठता के सिद्धांत को भी महत्वपूर्ण बताया गया है।

पत्र में कहा गया है कि यदि किसी प्रशासनिक व्यवस्था में वरिष्ठ अधिकारी के ऊपर कनिष्ठ अधिकारी को नियंत्रण अथवा पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी दी जाती है, तो ऐसी व्यवस्था का स्पष्ट वैधानिक आधार होना चाहिए, इसलिए प्राचार्यों ने संबंधित आदेश के पीछे लागू शासनादेशों, सेवा नियमों और सक्षम प्राधिकारी की शक्तियों की जांच कराने की मांग की है।

प्राचार्यों ने जांच के लिए कई बिंदु सामने रखे हैं। इनमें सबसे प्रमुख सवाल है कि अतिरिक्त संचालक पद का स्वीकृत संवर्ग क्या है और उसके लिए निर्धारित पात्रता क्या है। दूसरा सवाल है कि प्रभार दिए जाने के समय संभाग में उपलब्ध वरिष्ठ अधिकारियों की वरिष्ठता सूची क्या थी और उसका परीक्षण किया गया या नहीं।

इसके अलावा यह भी जांचने की मांग की गई है कि प्रभार आदेश किस सक्षम अधिकारी ने जारी किया और किस नियम के तहत जारी किया गया। क्या इस निर्णय के लिए उच्च स्तर की अनुमति आवश्यक थी? यदि आवश्यक थी तो क्या अनुमति ली गई? क्या संबंधित अधिकारी की पात्रता और संवर्ग का परीक्षण किया गया? और यदि प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी हुई है तो आदेश की समीक्षा तथा जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई किस स्तर पर होगी?

प्राचार्यों ने अपने पत्र में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रश्न उठाया है कि सरकारी व्यवस्था में किसी आदेश की वैधता सिर्फ इसलिए सुनिश्चित नहीं हो जाती कि वह किसी अधिकारी के हस्ताक्षर से जारी हुआ है। आदेश जारी करने वाले अधिकारी के अधिकार, संबंधित पद का संवर्ग, नियुक्ति अथवा प्रभार की पात्रता, वरिष्ठता और लागू शासनादेशों का अनुपालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि यदि वर्तमान व्यवस्था नियमों के अनुरूप है तो शासन उसका स्पष्ट आधार सामने रखे और यदि नियमों से अलग है तो उसे दुरुस्त किया जाए।

इस प्रकरण में प्राचार्यों ने मांग की है कि यदि जांच में प्रभार सौंपने की प्रक्रिया में नियमों या निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया की अनदेखी सामने आती है तो संबंधित आदेश की पुनर्समीक्षा की जाए। भविष्य में अतिरिक्त संचालक जैसे महत्वपूर्ण पदों का प्रभार पदानुक्रम और निर्धारित पात्रता के अनुरूप वरिष्ठ योग्य अधिकारी को सौंपने की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग भी की गई है।