प्रयागराज, 26 जून । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कानपुर के युवक उदित शुक्ला के खिलाफ दाखिल बलात्कार के आरोप में चार्जशीट रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने यह आदेश देते हुए कहा कि तीन साल तक सहमति से बने शारीरिक सम्बंधों वाली प्रेम-कहानी को, महज इसलिए बलात्कार नहीं कहा जा सकता क्योंकि शादी नहीं हुई।
पीड़िता ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2021 से 2024 के बीच आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक सबंध बनाए। दोनों एक ही कोचिंग सेंटर में पढ़ते थे। जब आरोपित को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी मिली और उसके पिता ने शादी से इंकार कर दिया, तब पीड़िता ने दिसम्बर 2024 में एफआईआर दर्ज कराई।
कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की उम्र लगभग 28 वर्ष थी और वह एक समझदार वयस्क महिला थी। तीन वर्षों तक उसने कोई शिकायत नहीं की। सम्बंध सहमति से बने थे, जिसकी पुष्टि फोटोग्राफ्स और गवाहों के बयान से हुई। स्वतंत्र गवाहों ने मारपीट और धमकी के आरोपों को झूठा बताया। इसलिए शादी न होने पर एफआईआर दर्ज करना ‘टूटे रिश्ते का बदला’ प्रतीत होता है।
कोर्ट ने कहा कि झूठा वादा और वादा न निभा पाना दोनों में फर्क होता है। अगर शुरू से ही धोखे की नीयत न हो तो शादी का वादा टूटना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रेम सम्बंधों को अपराध का रंग देने की बढ़ती प्रवृत्ति चिंताजनक है।
अदालत ने मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में रखते हुए पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।