नई दिल्ली, 29 मई । शहरों में बढ़ती जैविक कचरे की चुनौती को रोजगार, स्वच्छ ऊर्जा, क्लाइमेट एक्शन, म्युनिसिपल फाइनेंस और शहरी बुनियादी ढांचे के एक बड़े अवसर में बदला जा सकता है। यह जानकारी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर(सीईईडब्लयू) के एक स्वतंत्र अध्ययन से सामने आई है। इसमें पाया गया कि अनुकूल नीतियों के जरिए अगर भारत के जैविक कचरे के लिए सर्कुलर इकोनॉमी को अपनाया जाए तो 2047 तक 26 लाख प्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकते हैं और लगभग 51 अरब डॉलर के बाजार अवसर के रास्ते खुल सकते हैं। जैविक कचरे में रसोई, मंडियों, बागवानी से निकलने वाला कचरा, फल-फूल, सब्जी और मांस के साथ-साथ अन्य सड़ने-गलने वाले (बायोडिग्रेडेबल) कचरा शामिल है।
शुक्रवार को सीईईडब्ल्यू ने अपने अध्ययन, ‘ऑर्गेनिक वेस्ट सर्कुलर इकोनॉमी फॉर विकसित भारत: जॉब्स, इन्वेस्टमेंट, एंड एमिशंस पाथवेज टू 2047’ को जारी किया। इस अवसर पर दिल्ली के पर्यावरण, वन और वन्यजीव मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने अपने संदेश में कहा कि प्रधानमंत्री का आत्मनिर्भर भारत और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का दृष्टिकोण, कचरे से संसाधन (वेस्ट-टू-रिसोर्स) बनाने वाली प्रणालियों में मजबूती से व्यक्त होता है। दिल्ली के जैविक कचरे से उत्पादित होने वाला बायो-सीएनजी का हर एक किलोग्राम, आयातित जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) के एक किलोग्राम के बराबर है, जिसकी हमें ज़रूरत नहीं है। किसी बाजार या आवासीय कॉलोनी में स्थापित प्रत्येक कम्पोस्ट (खाद) यूनिट, शहरी पोषक चक्र (अर्बन न्यूट्रिएंट लूप) को पूरा करने की दिशा में एक कदम है।
दिल्ली नगर निगम के इंजीनियर-इन-चीफ पी. सी. मीना ने कहा, “दिल्ली नगर निगम अब योजनाबद्ध और संरचनात्मक रूप से विकल्पों को तैयार कर रहा है। दिल्ली के प्रमुख डेयरी क्लस्टरों- नांगली, गोयला, घोगा और भलस्वा में बायोमेथेनेशन प्लांट (जैव-मीथनीकरण संयंत्र) चालू किए जा रहे हैं, जहां हम राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ मिलकर भी काम कर रहे हैं। इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड के साथ साझेदारी में, हम बायो-सीएनजी बुनियादी ढांचे का विकास कर रहे हैं जो कचरा प्रसंस्करण (वेस्ट प्रोसेसिंग) को शहर के गैस वितरण नेटवर्क के साथ जोड़ता है।”
सीईईडब्ल्यू की फेलो प्रार्थना बोराह ने कहा, “कचरा प्रबंधन स्वच्छ हवा से संबंधित बुनियादी ढांचा है। खुले में कचरा जलाना भारतीय शहरों में हानिकारक पीएम2.5 उत्सर्जन में लगभग 10 प्रतिशत का योगदान देता है, जबकि उचित प्रबंधन न होने पर जैविक कचरा मीथेन, दुर्गंध, आग का जोखिम और प्रदूषण बढ़ाता है, जिससे पुनर्चक्रण योग्य (रीसायकल होने लायक) सामग्रियों की रिकवरी वैल्यू घट जाती है। जैसे-जैसे भारतीय शहरों का विस्तार हो रहा है, कचरा प्रबंधन प्रणालियां न केवल मौसमी प्रदूषण के समय, बल्कि पूरे साल हवा की गुणवत्ता और जीवन जीने की सुगमता तय करेंगी। वर्तमान में, भारतीय शहरों में प्रतिदिन लगभग 1,71,000 टन शहरी ठोस कचरा पैदा होता है, जिसमें से करीब आधा हिस्सा जैविक कचरे होता है। मौजूदा समय में कुल शहरी ठोस कचरे का लगभग 61 प्रतिशत हिस्सा ही उपचारित (ट्रीटमेंट) किया जाता है। वर्ष 2047 तक, केवल शहरी क्षेत्रों से निकलने वाला जैविक कचरा सालाना लगभग 208 मिलियन टन तक पहुंच सकता है।
सीईईडब्ल्यू की प्रोग्राम लीड प्रियंका सिंह ने कहा, “भारत ने जैविक कचरा प्रबंधन के लिए पहले से ही एक मजबूत नीतिगत आधार तैयार कर लिया है। हमारे अध्ययन से पता चलता है कि इसमें नौ कार्यक्रमों, तीन नीतिगत दिशानिर्देशों और सात योजनाओं के माध्यम से लगभग 16 मंत्रालय और सरकारी निकाय जुड़े हुए हैं। स्वच्छ भारत मिशन-शहरी, राष्ट्रीय जैव ऊर्जा कार्यक्रम और गोवर्धन योजना ने कचरे के निपटान (निस्तारण) के बजाय उससे संसाधन बनाने (रिसोर्स रिकवरी) की सोच को प्रोत्साहित किया है।