कालिंजर में बनेगा ‘ऋषिकुल वैदिक विलेज’, 30 करोड़ की परियोजना से पर्यटन को मिलेगा वैश्विक पहचान

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उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग की तलहटी में 18 बीघा भूमि पर जिला पंचायत बांदा द्वारा प्रस्तावित ‘ऋषिकुल वैदिक विलेज’ बहुआयामी परियोजना जल्द ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर अपनी पहचान बनाएगी। लगभग 30 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह प्रोजेक्ट छह चरणों में पूरा किया जाएगा, जिसमें प्रत्येक चरण की लागत करीब 5 करोड़ रुपये निर्धारित की गई है।

जिला पंचायत के कार्याधिकारी डॉ. सुजीत कुमार मिश्रा ने मंगलवार को बताया कि यह परियोजना पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर विकसित की जाएगी, जिसमें पूंजीपति, इंजीनियर, शिक्षक, वकील सहित आम जनमानस भी निवेश कर सकेंगे।

उन्होंने बताया कि कलिंगा आर्किटेक्चर प्राइवेट लिमिटेड द्वारा 25 दिसंबर 2025 को परियोजना का सर्वे किया गया है। यह प्रोजेक्ट जिला पंचायत के स्वामित्व वाली भूमि खसरा संख्या 1082, 1083, 1084 और 1088 (कुल 18 बीघा 10 बिस्वा) पर विकसित किया जाएगा। परियोजना का अनुमोदन जिला पंचायत की आगामी बैठक में प्रस्तावित है।

‘ऋषिकुल वैदिक विलेज’ केवल एक पर्यटन केंद्र नहीं, बल्कि “कांशस लिविंग” की अवधारणा पर आधारित समग्र जीवन शैली ग्राम होगा। इसमें प्रकृति, आध्यात्मिकता, स्वास्थ्य और सतत विकास के सिद्धांतों को कृषि के साथ एकीकृत किया जाएगा। कालिंजर दुर्ग की ऐतिहासिक विरासत और प्राकृतिक परिवेश को ध्यान में रखते हुए यह परियोजना क्षेत्र को एक विशिष्ट वैश्विक पर्यटन गंतव्य के रूप में विकसित करेगी।

परियोजना का मास्टर प्लान पंचतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—पर आधारित होगा। इसमें ध्यान मंडप, सरस्वती वैदिक केंद्र, नक्षत्र डेक, आवासीय क्लस्टर व गेस्ट डवेलिंग्स, हाइड्रोथेरेपी पूल, पंचकर्म हीलिंग यूनिट, यज्ञशाला और कम्युनिटी एम्फीथिएटर जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी, जहां सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित होंगे।

यह परियोजना न केवल आध्यात्मिक और वेलनेस टूरिज्म को बढ़ावा देगी, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित करेगी। आतिथ्य, कृषि, बागवानी, पारंपरिक हस्तशिल्प और वेलनेस सेवाओं के माध्यम से क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

इसके साथ ही प्रोजेक्ट में पंचधातु से नानाजी देशमुख की प्रतिमा या स्तंभ स्थापित करने का भी प्रस्ताव है, जो इस वैदिक ग्राम की सांस्कृतिक पहचान को और सशक्त बनाएगी।