रुद्रप्रयाग, 14 फरवरी । विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ ज्योतिर्लिंग धाम के कपाट खुलने की शुभ तिथि महाशिवरात्रि पर घोषित की जाएगी। शीतकालीन गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मंदिर में पंचांग गणना के बाद विद्वान आचार्यों और हक-हकूकधारियों की उपस्थिति में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यह निर्णय लिया जाएगा।
इस वर्ष की घोषणा इसलिए भी खास है क्योंकि केदारनाथ धाम के नए रावल केदार लिंग के नाम की आधिकारिक घोषणा भी की जाएगी। महाशिवरात्रि के अवसर पर ओंकारेश्वर मंदिर को भव्य रूप से सजाया गया है। परंपरा के अनुसार सुबह की विशेष पूजा-अर्चना के बाद मंदिर के कपाट खुलने का मुहूर्त सार्वजनिक किया जाएगा। साथ ही बाबा की पंचमुखी डोली के धाम प्रस्थान का पूरा कार्यक्रम भी जारी होगा।
केदारनाथ धाम को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में ग्यारहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है। ग्रीष्मकाल में छह माह नर और शीतकाल में छह माह देवता भगवान केदारनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं। शीतकाल में बर्फबारी के कारण कपाट बंद रहते हैं और पूजा-आराधना शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में संपन्न होती है।
धाम के इतिहास के अनुसार, द्वापर युग में पांडवों ने यहां स्थापना की थी। मान्यता है कि भगवान शिव ने पांडवों को महिष रूप में दर्शन दिए और उनके द्वारा केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई। मंदिर के गर्भगृह में त्रिकोणीय आकार का शिवलिंग स्थित है। केदारनाथ धाम मंदाकिनी नदी का उद्गम स्थल भी है। प्रत्येक वर्ष अप्रैल-मई में कपाट ग्रीष्मकाल के लिए भक्तों के दर्शन हेतु खुलते हैं, जबकि दीपावली के बाद भैयादूज पर बंद किए जाते हैं।
नए रावल ’केदार लिंग’ का महत्त्व
रावल परंपरा के अनुसार धाम की पूजा पद्धति और धार्मिक व्यवस्थाओं का सर्वोच्च निर्वहन करते हैं। केदारनाथ के रावल दक्षिण भारत के कर्नाटक के वीरशैव (लिंगायत) संप्रदाय से आते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपरा के अनुसार विद्वान रावल ही मुख्य पुजारी होते हैं। रावल का पद धार्मिक और संयम का प्रतीक है और उन्हें आजीवन अविवाहित रहना अनिवार्य होता है। कपाट खुलने और बंद होने के विशेष अवसरों पर रावल की उपस्थिति अनिवार्य होती है, और उनके आशीर्वाद एवं विशेष पूजा के बाद ही धाम के द्वार भक्तों के लिए खोले जाते हैं।