सुबह से ही व्रती महिलाएँ घरों की साफ-सफाई कर पूजा की तैयारियों में जुटी रहीं। शाम के समय सूर्यास्त के बाद विधि-विधान से खरना पूजा की जाती है। व्रतियों द्वारा गुड़, दूध और चावल से बनी खीर, गेहूं की रोटी और केले का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद को मिट्टी या कांसे के बर्तनों में रखकर सूर्य देव और छठी मईया को अर्पित किया जाता है। पूजा के उपरांत व्रती प्रसाद ग्रहण कर उपवास तोड़ते हैं और फिर यही प्रसाद परिवारजनों तथा आस-पड़ोस के लोगों के बीच वितरित किया जाता है।
खरना के साथ छठ महापर्व का मुख्य अनुष्ठान आरंभ हो जाता है, जो अगले दो दिनों तक चलता है। तीसरे दिन संध्या अर्घ्य के अवसर पर श्रद्धालु डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं, जबकि चौथे दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ यह महापर्व सम्पन्न होता है। यह पर्व न केवल सूर्य उपासना का प्रतीक है, बल्कि शुद्धता, संयम और सामाजिक एकता का भी संदेश देता है।
वातावरण पूरी तरह छठमय हो उठा है। घरों और घाटों पर छठ गीतों की मधुर गूंज सुनाई दे रही है। व्रती महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में पूजा की तैयारी कर रही हैं, वहीं घाटों पर सफाई और सजावट का कार्य भी अंतिम चरण में है। लोग अपने परिजनों के साथ घाटों की ओर प्रस्थान करने की तैयारी में जुटे हैं।
छठ पर्व की विशेषता इसका अनुशासन, स्वच्छता और सामूहिकता है। व्रती महिलाएं पूरे परिवार और समाज के कल्याण की कामना करते हुए सूर्य देव और छठी मईया की आराधना करती हैं। खरना के इस पवित्र दिन के साथ ही वातावरण में भक्ति, आस्था और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।