श्रीराम में मनुष्यता की सभ्यता

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शारदीय नवरात्रि प्रारंभ हो चुके हैं। दो अक्टूबर को दशहरा है। दशहरा यानी विजयोत्सव। बुराई के ऊपर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में दशहरा मनाने की परंपरा सदियों से जीवंत है। लंकेश पर अयोध्यानंदन की विजय का यह पर्व राम के विविध पक्षों को सामने रखता है। इनमें राम का मानवीय रूप भारतीय जनता के लिए महानायकत्व है। उनका जीवन एक गहन सांस्कृतिक पाठ है । एक ऐसी वर्णमाला, जिसमें कोल, किरात, भील, वनवासी सभी शामिल हैं । उनका उत्सव अतीत का समारोहण नहीं, वर्तमान के ही क्षणों का सर्वश्रेष्ठ उकेरन है । जैसे -विरोधी परिस्थितियों को अनुकूल बनाना, समय- प्रबंधन, मित्र-विस्तार, आकांक्षाओं के अतिरेक से बचाव, उद्देश्य के लिए सत्ता का परित्याग, मित्र को बल देना, न कि ताकत को; शत्रु से भी अच्छाई सीखना, टीम का सगुण नेतृत्व व प्रबंधन, सहयोगी को स्थापित कर देना आदि । गिलहरी से सहायता पाकर, भिलनी से बेर खाकर , हनुमान को साथी बनाकर उन्होंने एक भिन्न आयाम प्रदान किया । कहा जा सकता है कि विशाल भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की विभिन्न सतहों पर और तहों में गतिशील तत्वों के बनते – बिगड़ते समीकरण राम में सघन रूप से समाहित हो जाते हैं ।

सत्ता के विभिन्न पक्ष, परिवार के सरस-नीरस प्रसंग, घात – प्रतिघात, निष्ठा व कृतघ्नता आदि प्रक्रियाओं से लेकर मनुष्य के मनुष्यतर बनने की महागाथा सूक्ष्म तरीके से धारा में कभी प्रकट, कभी अप्रकट ढंग से राम के जीवन व आस-पास के संदर्भों में दिख जाती हैं । यानी कह सकते हैं कि यह एक ऐसी भारतीय जीवनानुभव की प्रक्रिया है जहां राम से जुड़ी कविता पौराणिकता को अतिक्रांत करती हुई किंचित् ऐतिहासिकता में प्रविष्ट हो जाती है । राम कथा की भाषा जनता के सरोकारों से आती है, इसलिए जनता को छूती है । कोई ऐसा गांव नहीं, जहां राम की लीला नहीं । मनुष्यता की लीला । मनुष्य से मनुष्यतर होते जाने की लीला । आज मनुष्य साइबर स्पेस व पौराणिक युग दोनों को एक साथ साध लेता है । उत्तर आधुनिकता इसे वर्तमान में अतीत की उपस्थिति कहती है । मेरा मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति अपना मांगल्य स्वयं रचता है । यथार्थ से आगे । क्योंकि प्रत्येक यथार्थ विखण्डित व आंशिक है । सृजन व संहार की शक्तियां प्रत्येक युग में रही हैं। राम के आगमन का अर्थ रचनाशीलता का सृजन व दु:शीलता का संहार ही है।

आज भी रचनात्मकता के उत्कर्ष के पीछे मांगल्य– विधान ही होता है । इसीलिए श्रेष्ठता के तरीके भले बदल गए हों उसकी इयत्ता व फलश्रुति के आयाम कमोबेश वही हैं । सृजन व संहार को दुर्गा की गत्यात्मकता ने संतुलित किया था । इसीलिए राम की शक्ति पूजा का अर्थ सृजन की स्थापना के पक्ष में प्रतिक्रमण ही है । अंतत: हमारा यह समाज सृजन की चुनौतियों को स्वीकार करने वाला समाज है । आज भी हम आतंक, अशिक्षा, भुखमरी, गरीबी, तनाव, संबंधहीनता को नए सिरे से संघर्ष करते हुए बदलाव करने की ओर सचेष्ट हैं । सच्चाई यह है कि जब किसी युग की संस्कृति और उसके मूल्य नयी शक्तियों, अन्वेषणों और विचारों से उत्पन्न समस्याओं की चुनौती को स्वीकार करने में असमर्थ रहे तो इसका अभिप्राय है कि वह सभ्यता संकट का शिकार हो चुकी है । किंतु भारतीय मन आज भी अपने सृजनात्मक व सांस्कृतिक स्रोतों, इनके क्लासिक व विकसित होते सौंदर्य शास्त्रों को समझने व सकारात्मक पक्षों को धारण करने में समर्थ है ।

राम के प्रसंग के आधार पर उस कथा को गहराई से देखें तो कई चीजें अपने आप निकलती आती हैं । जैसे सूर्य का महत्व । राम का व्यक्तित्व सूर्य की आभा से आप्लावित है । पदार्थ सिर्फ रूपांतरित होता है । शक्ति भी रूपांतरित होती है । आत्मा के लिए मृत्यु नहीं है । कवि वाल्मीकि ने सोच समझ कर राम को नायक बनाया। व्यास ने वाल्मीकि का अनुसरण किया तथा कालिदास ने व्यास का । अन्यों ने कालिदास से प्रेरणा ली । राम से जुड़े साहित्य वास्तव में अन्तर्विषयीय प्रक्रिया को नए आयाम देते हैं किंतु यह साहित्य ही है अन्य शास्त्रों का उपज्ञान नहीं ।

राम का जीवन अंतत: कविता ही था । कविता की क्लासिकी व लोक वृत्ति राम को आज तक सबको आप्लावित किए हुए है । सबने अपने अपने राम को अपने भीतर सृजित कर लिया है । राम का नायकत्व सहमति व असहमति को अतिक्रांत कर चुका है । राम को सिर्फ ‘नैतिक’के ढांचे में बांधना वृहत्तरता को सीमित करना है । उनके व्यक्ति में संबंधों की छायाएं नया आकार लेती हैं, प्रारंभिक जीवन में सत्ता के त्याग की अनूठी धारणा सामने आती है । उनको हर जगह सही सिद्ध करने का आग्रह साहित्य की बहुवचनात्मकता के विरुद्ध है अर्थात् राम का चरित्र ढेर सारी धाराओं में समंजन करने में समर्थ था । यद्यपि राम के चरित्र को साहित्य में कवि ने गढ़ा है किंतु गढ़े जाने के बाद भारतीय समाज में लगभग प्रत्येक व्यक्ति में अपने-अपने ढंग से समा गया है। यानी समय-सापेक्ष राम की छवि का रूप परिवर्द्धित होता रहा है । राम आज भी भारतीय जन के उत्कृष्ट प्रतीक बने हुए हैं । उनमें मनुष्य की जिजीविषा की समस्त प्रज्ञाएं मौजूद हैं ।

वनों, पहाड़ों, पठारों, समुद्र, नदियों से लेकर खेत खलिहानों, गांवों की धूल-धूसरित बस्तियों और चमकते- दमकते महानगरों के फुटपाथों व झोपड़-पट्टियों तक मनुष्य का विस्तार है । सबके अपने संघर्ष व अंतर्संघर्ष हैं । सबके पास दंत कथाएं हैं, आख्यान हैं, श्रुतियां हैं । किंतु यह उनके आंतरिक मूल का संवेद है, ऑब्सेशन नहीं । राम हमारी मनुष्यता की सहजता, संबंधमयता, तेजस्विता व आभामयता की अविस्मरणीय गाथा हैं, जहां एक के बदले अनेक पर बल है तथा विकेंद्रीयता पर रोशनी । आवश्यक भाषा, आवश्यक कर्म व जन जुड़ाव राम को वृहद् आयाम देते हैं ।

(लेखक, नामचीन ललित निबंधकार हैं।)