बांध निर्माण से नहीं सुलझेगा जल संकट, जनभागीदारी से निकलेगा समाधान: सीआर पाटिल

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पाटिल ने यह बात यहां आयोजित ‘पाञ्चजन्य आधार इंफ्रा कॉन्फ्लुएंस 2025’ में कही, जिसकी थीम “नीति, नवान्वेषण, क्रियान्वयन” थी। पाटिल ने कहा कि भारत में औसतन 4020 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) वर्षा जल उपलब्ध होता है, जबकि देश की वार्षिक जल आवश्यकता लगभग 1220 बीसीएम है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक भारत की अनुमानित जल आवश्यकता लगभग 1180 बीसीएम होगी। इस लक्ष्य की पूर्ति और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए जल संचयन को प्राथमिकता दी जा रही है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 सितम्बर 2024 को सूरत से वर्चुअल संबोधन में इस बात पर बल दिया था कि जल संचयन केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि इसे जन आंदोलन बनाने की आवश्यकता है। पाटिल ने कहा कि स्वच्छ भारत और सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जल संरक्षण को समाज के हर वर्ग की भागीदारी से मजबूत बनाना होगा।

उन्होंने जानकारी दी कि वर्तमान में देश में छोटे-बड़े करीब 56 हजार बांध मौजूद हैं, जिनकी कुल भंडारण क्षमता केवल 750 बीसीएम के आसपास है। जबकि वास्तविक आवश्यकता को देखते हुए देश को करीब 450 बीसीएम अतिरिक्त जल भंडारण क्षमता की जरूरत है।

बांध निर्माण को लेकर चुनौतियों पर पाटिल ने कहा कि लगभग सभी प्रमुख नदियों पर पहले से ही बांध बने हुए हैं या निर्माणाधीन हैं। एक बड़ा बांध बनाने में कम से कम 25 वर्ष का समय और 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की लागत आती है। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण, किसानों का विरोध, पर्यावरणीय बाधाएं और लंबी स्वीकृति प्रक्रिया के कारण परियोजनाओं में देरी और खर्च दोनों बढ़ते हैं।

उन्होंने कहा कि देश के पास अब इतना समय नहीं है कि केवल बांध निर्माण पर निर्भर रहा जाए। जल संचयन, पुनर्चक्रण, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन और स्थानीय स्तर पर जनभागीदारी से ही जल संकट का दीर्घकालिक समाधान संभव है।