भारत का विभाजन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था, बल्कि वह एक ऐसी त्रासदी थी जिसने इस उपमहाद्वीप के करोड़ों लोगों के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। यह घटना केवल भौगोलिक सीमाओं का बंटवारा नहीं थी, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक स्तर पर भी भारतीय समाज को गहरी चोट देने वाली थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ जुड़ी यह विभीषिका हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर किन कारणों से वह स्थिति उत्पन्न हुई, जिसने एक अखंड सभ्यता, साझा परंपराओं और हजारों साल पुरानी एकता को अचानक तोड़ दिया।
आज जब यह सवाल उठता है कि विभाजन का जिम्मेदार कौन था, तो तथ्यों और इतिहास की ठोस पड़ताल से यह बात स्पष्ट होती है कि इसके लिए जिन्ना, कांग्रेस और माउंटबेटन तीनों बराबर रूप से जिम्मेदार थे। एनसीईआरटी का हाल ही का पाठ्य मॉड्यूल इसी सच्चाई को रेखांकित करता है और यही कारण है कि इस पर कुछ वर्गों द्वारा विवाद खड़ा किया जा रहा है। परंतु यदि हम निष्पक्ष और ठोस ऐतिहासिक साक्ष्यों को देखें तो इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता कि विभाजन इन्हीं तीन कारकों के सम्मिलित निर्णय और क्रियान्वयन का परिणाम था।
विभाजन से जुड़ी विभीषिका की भयावहता को समझने के लिए उसके मानवीय और सांस्कृतिक आयामों पर भी ध्यान देना चाहिए। लगभग बीस लाख लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिंसा का शिकार हुए और लाखों महिलाओं के साथ अमानवीय अत्याचार हुए। बारह से पंद्रह मिलियन लोग अपने पुश्तैनी घरों से उखाड़े गए और शरणार्थियों के रूप में भारत या पाकिस्तान की ओर पलायन करने को मजबूर हुए। पंजाब, बंगाल और सिंध जैसी समृद्ध सांस्कृतिक इकाइयाँ खंडित हो गईं। धार्मिक उन्माद और अविश्वास की आग ने पड़ोसियों को दुश्मन बना दिया। यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ, बल्कि यह राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, नीतिगत भूलों और औपनिवेशिक षड्यंत्रों का परिणाम था।
मुस्लिम लीग और जिन्ना की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में केंद्रीय रही। जिन्ना ने प्रारंभिक दौर में कांग्रेस के साथ मिलकर काम किया था और खुद को ‘हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत’ के रूप में प्रस्तुत किया था। लेकिन धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि कांग्रेस में उनका प्रभाव सीमित होता जा रहा है और यही असंतोष आगे चलकर कटुता में बदल गया, जिसके बाद जिन्ना ने मुस्लिम लीग को एक अलग ताकत के रूप में खड़ा किया। 1940 का लाहौर प्रस्ताव इस दिशा में निर्णायक मोड़ था, जब मुस्लिम लीग ने पहली बार औपचारिक रूप से पाकिस्तान की मांग रखी। इसके बाद जिन्ना ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ जैसे हिंसक आंदोलनों का सहारा लिया, जिनके परिणामस्वरूप हजारों लोग मारे गए।
जिन्ना का तर्क था कि मुसलमानों की राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान हिंदुओं से बिल्कुल भिन्न है और वे एक ही राष्ट्र में रहकर सुरक्षित नहीं रह सकते। यह विचारधारा मूलतः विभाजनकारी थी, जिसने भारत के सांस्कृतिक ताने-बाने को सबसे गहरा आघात पहुँचाया। लेकिन केवल जिन्ना और मुस्लिम लीग को ही दोष देना ऐतिहासिक दृष्टि से अधूरा है। कांग्रेस के नेताओं की नीतिगत भूलें भी उतनी ही बड़ी वजह थीं। गांधीजी का यह मानना कि मुसलमानों के साथ लगातार रियायतें देकर उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन में बनाए रखा जा सकता है, एक रणनीतिक गलती थी। खिलाफत आंदोलन का समर्थन इसी का उदाहरण है, जिसने भारत की राष्ट्रीय चेतना को धार्मिक आधार पर बाँटने की नींव रखी।
नेहरू और पटेल, जो उस समय कांग्रेस की मुख्यधारा का नेतृत्व कर रहे थे, अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि विभाजन के बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है। पटेल ने कई बार यह कहा कि यदि विभाजन से देश की आज़ादी शीघ्र आ सकती है तो इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। नेहरू भी सत्ता हस्तांतरण में जल्दबाज़ी के पक्षधर थे। लोहिया जैसे समाजवादी चिंतकों ने उस समय ही यह कह दिया था कि कांग्रेस ने पाकिस्तान को ‘एक मजबूरी नहीं बल्कि अपनी सुविधा के लिए स्वीकार किया’। इस तरह कांग्रेस की राजनीतिक सोच और सत्ता प्राप्ति के उतावले पन ने विभाजन को और तेज़ कर दिया।
इसके अलावा एक तीसरा पक्ष भी है, ब्रिटिश सत्ता की भूमिका, यहां इसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन आर्थिक और राजनीतिक रूप से बहुत कमजोर हो चुका था और वह भारत को जल्द से जल्द छोड़ना चाहता था। वावेल जैसे गवर्नर जनरल अखंड भारत के पक्ष में थे, लेकिन 1947 में जब एटली की लेबर सरकार ने सत्ता माउंटबेटन को सौंपी, तो परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। माउंटबेटन ने जानबूझकर सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को जल्दबाज़ी में पूरा किया। उन्होंने सीमाओं के निर्धारण का जिम्मा सर रेडक्लिफ जैसे व्यक्ति को सौंपा, जिन्हें भारत के भूगोल और समाज की कोई गहरी समझ नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि सीमाएँ खींचने का काम बिना स्थानीय वास्तविकताओं की परवाह किए जल्दबाज़ी में हुआ और पंजाब तथा बंगाल जैसे प्रदेश दो हिस्सों में बँटकर हिंसा की ज्वाला में झोंक दिए गए। माउंटबेटन के इस रवैये की आलोचना आज भी इतिहासकार करते हैं कि यदि थोड़ा धैर्य रखा जाता तो इतनी भयावह हिंसा को टाला जा सकता था।
कांग्रेस नेताओं की वैचारिक कमजोरी भी इस पूरी प्रक्रिया में सामने आई। जिन्ना ने इस्लामी अलगाववाद की खुलकर पैरवी की और अपनी मांग को कठोरता से रखा। इसके विपरीत कांग्रेस नेताओं ने इस चुनौती का वैचारिक स्तर पर सामना करने के बजाय समझौतों और रियायतों का रास्ता अपनाया। इस्लामी राजनीति के मूल चरित्र मजहबी राष्ट्रवाद और अलगाववाद को कभी गहराई से चुनौती नहीं दी गई। इसके बजाय अंग्रेजों को दोषी ठहराकर समस्या से बचने की कोशिश की गई। इससे मुस्लिम लीग का मनोबल बढ़ता गया और कांग्रेस बार-बार पीछे हटती रही।
दिलचस्प बात यह है कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे नेता, जिन्होंने खुद को राष्ट्रवादी घोषित करने का प्रयास किया, वह भी मूलतः एक इस्लामी चिंतन से प्रेरित थे। वे कांग्रेस के भीतर मुस्लिम लीग के विकल्प के रूप में देखे जाते थे, परंतु अंततः उनका झुकाव भी इस्लामी पहचान की रक्षा पर अधिक था, न कि एक पूर्ण धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत राष्ट्र खड़ा करने पर। यही कारण था कि देवबंद के उलेमा और अन्य मुस्लिम बुद्धिजीवी भले ही विभाजन के विरोधी थे, परंतु उनकी सोच में भी इस्लाम की सर्वोच्चता और अलग पहचान को लेकर गहरी चिंता थी। इस प्रकार भारत में मुस्लिम राजनीति का मूल चरित्र कभी पूरी तरह बदला ही नहीं। इसलिए जिस गजबा-ए-हिंद का सपना विभाजन के पूर्व देखा जा रहा था, वह आज भी देखा जा रहा है।
शिक्षा व्यवस्था और इतिहास लेखन ने भी स्वतंत्र भारत में इस सच्चाई को दबाने का काम किया। लंबे समय तक हमारे इतिहास की किताबों में इस्लामी आक्रमणों की विभीषिका, धार्मिक कट्टरता और विभाजन के असली कारणों को दबाया गया। इसके बजाय मुगलकाल का महिमामंडन किया गया और विभाजन के लिए केवल अंग्रेजों को दोषी ठहराने की कहानी गढ़ी गई। यह वैचारिक प्रवृत्ति इतनी गहरी रही कि पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ यह मानती रहीं कि विभाजन अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का परिणाम था। जबकि सच यह है कि मुस्लिम लीग की स्पष्ट माँग, कांग्रेस की स्वीकृति और अंग्रेजों के क्रियान्वयन, इन तीनों के मेल से भारत का विभाजन हुआ था।
आज एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में जब यह सच्चाई सामने रखी जा रही है कि जिन्ना, कांग्रेस और माउंटबेटन तीनों ही जिम्मेदार भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार हैं, तब कुछ राजनीतिक दल और विचारधाराएँ इसे विवादित बताने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन वस्तुतः यह विवाद केवल वैचारिक है, तथ्यात्मक नहीं। ऐतिहासिक दस्तावेज़, कांग्रेस नेताओं के भाषण, जिन्ना के वक्तव्य और ब्रिटिश शासन के आधिकारिक रिकार्ड इस सच्चाई की गवाही देते हैं। कोई भी निष्पक्ष इतिहासकार इस तथ्य को नकार नहीं सकता कि विभाजन इन्हीं तीन शक्तियों के आपसी तालमेल और निर्णय का परिणाम था। विभाजन का संक्षेप में सत्य यही है कि मुस्लिम लीग ने मांग रखी, कांग्रेस ने उसे स्वीकार किया और अंग्रेजों ने उसका क्रियान्वयन किया। यह तीन वाक्य ही उस पूरी त्रासदी का सार हैं, जिसने करोड़ों लोगों को उजाड़ दिया और भारत की आत्मा को गहरी चोट पहुँचाई।
वस्तुत: इस सच्चाई को नई पीढ़ी को जानना अति आवश्यक है कि यदि हम अपने इतिहास को सही रूप में नहीं जानेंगे तो भविष्य की गलतियों से कैसे बचेंगे? विभाजन केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए चेतावनी है। यह हमें बार-बार याद दिलाता है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा, वैचारिक कमजोरी और बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप मिलकर किस तरह किसी राष्ट्र की एकता को तोड़ सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारी पाठ्यपुस्तकें और हमारी सामूहिक स्मृति इस सच्चाई को स्वीकार करें और आने वाली पीढ़ियों को बताएं कि विभाजन किसकी जिम्मेदारी थी।
अत: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के विशेष शैक्षिक मॉड्यूल में भारत के विभाजन के लिए मोहम्मद अली जिन्ना, कांग्रेस और लॉर्ड माउंटबेटन को जो जिम्मेदार ठहराया गया है और ‘विभाजन के अपराधी’ शीर्षक से कक्षा 6 से 8 और कक्षा 9 से 12 के छात्रों के लिए अलग-अलग रूप में जो अपना प्रकाशन किया है वह सही है। वास्तव में यह बताया है कि किसकी गलतियों के कारण से विभाजन के समय करीब 6 लाख लोग मारे गए और 1.5 करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। यहां कहना यही है कि आज सभी को बिना विवाद के इतिहास के इस सच को स्वीकार करना चाहिए, निसंदेह अपने वर्तमान को सही तथ्यों से अवगत करना हम सभी का कार्य है, यदि सरकार ये कार्य कर रही है, तो हमें उसका समर्थन करना चाहिए न कि विरोध। सही अर्थों में यह भी देश भक्ति है और देश हित ।