गुरुवार को दीपक के पिता हिमांशु बारीक ने बताया कि बेटे की दिव्यांगता से संबंधित सभी दस्तावेज समय पर प्रखंड कार्यालय, पंचायत भवन और सरकारी अस्पतालों में जमा कर दिए हैं। लेकिन तीन वर्षों के दौरान केवल आश्वासन ही दिया गया है। इसे लेकर उनका परिवार कई बार अधिकारियों से मिलकर आग्रह किया लेेेकिन जवाब में अधिकारियों की केवल खामोशी और बेरुखी ही मिली है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मामला प्रशासन की संवेदनहीनता का उदाहरण है।
इस मामले को मानव अधिकार परिषद के झारखंड प्रदेश महासचिव रामहरि गोप ने गंभीरता से उठाया है। उन्होंने प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल उठाते हुए कहा कि दीपक की उपेक्षा केवल एक व्यक्ति की अनदेखी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करती है। उन्होंने कहा, जब एक नागरिक सभी दस्तावेजों और प्रक्रियाओं को पूरा करने के बावजूद हक से वंचित रहता है, तो यह स्पष्ट करता है कि व्यवस्था में खामी है।
गोप ने इस विषय में पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त को ट्वीट कर त्वरित कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने इसे प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध अपराध करार दिया है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला राज्य और राष्ट्रीय स्तर के मानवाधिकार आयोगों तक लेकर जाएंगे।