**मामला: एशियन डेवलपमेंट बैंक से मिली धनराशि का घोटाला**
एशियन डेवलपमेंट बैंक द्वारा चकाचक सड़क के नाम पर 6 करोड़ रुपये की मंजूरी के मामले ने नया मोड़ ले लिया है। लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकारियों, इंजीनियरों और कर्मचारियों के बीच फूट पड़ गई है, जिसके परिणामस्वरूप यह मामला सार्वजनिक हुआ है। सूचना मिलते ही लखनऊ में इस मामले की गंभीरता को समझते हुए तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया गया। दैनिक भास्कर की टीम ने इस मामले की गहराई में जाकर पूरी जांच की, जिससे मालूम हुआ कि कैसे यह पैसों का खेल तैयार किया गया।
जांच के दौरान हमने पाया कि यह सड़क कप्तानगंज-हाटा से शुरू होकर देवरिया के गौरी बाजार से होते हुए रुद्रपुर तक जाती है। यह सड़क पूरी तरह से सही हालत में है, जिसमें कहीं भी गड्ढे नहीं हैं। जब हम देवरिया के PWD कार्यालय पहुंचे, तो वहां अधिकतर अधिकारी अनुपस्थित थे। मौजूद ठेकेदारों से बातचीत के बाद यह जानकारी मिली कि कुछ लोगों को उनके हिस्से का भुगतान नहीं मिल रहा था, जिसके कारण विवाद उत्पन्न हुआ और यह मामला सामने आ गया। बजट बाबू रविंद्र गिरी से हमारे हिडन कैमरे पर बातचीत के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि अगर वो फंसते हैं तो दूसरों को भी घसीटेंगे।
कर्मचारियों और ठेकेदारों के बीच आपसी विवाद ने इस पूरे मामले को उजागर किया। चपरासी ने जानकारी दी है कि हिडन कैमरे की सहायता से हमने पता किया कि अधिकारी पासवान, सुधांशु और क्षितिज जैसे इंजीनियर्स इस घोटाले में शामिल थे। कार्यवाही के दौरान कई कर्मचारियों ने यह भी बताया कि कंप्यूटर ऑपरेटर पर सारा ठीकरा डालने की योजना बनी थी। इससे यह साफ होता है कि यह मामला न केवल पैसे की हेराफेरी है, बल्कि एक सुनियोजित साजिश भी थी।
वहीं, मुख्यालय से जुड़े बजट सेक्शन के विनय शुक्ला ने विस्तार से बताया कि एशियन डेवलपमेंट बैंक द्वारा काम पूरा होने के बाद भी PWD की रिपोर्ट में पुराना अधूरा कार्य पेंडिंग दिख रहा था। जिस पर दावा किया गया कि उसी आधार पर अतिरिक्त धनराशि माँगी गई। उनके अनुसार, इतनी बड़ी गड़बड़ी बिना किसी पूर्व ज्ञान के नहीं की जा सकती।
जांच समिति की अध्यक्षता हेमराज सिंह कर रहे हैं, जिन्होंने 4 अप्रैल को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन अब तक कोई रिपोर्ट नहीं आई। यही नहीं, यह बात भी सामने आई है कि जिन अधिकारियों पर सीधे आरोप थे, वही मामले की जांच कर रहे हैं। दैनिक भास्कर की टीम ने अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की, परंतु अधिकांश ने मामले से मुंह मोड़ लिया या बातचीत से इंकार कर दिया।
इस मामले में देवरिया के दो विधायक भी आगे आए हैं, जिन्होंने विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोला है। अब देखना यह है कि जांच समिति इस पूरे मामले की गहराई में जाकर वास्तविकता को उजागर कर पाती है या नहीं। यह भी भविष्य में निर्धारित करेगा कि कौन से अधिकारी इस घोटाले से बचने में सफल होते हैं और कौन से कठोर कदमों का सामना करते हैं।
**निष्कर्ष**: यह मामला भ्रष्टाचार के एक बड़े चक्रव्यूह को उजागर करता है, जिसके अंतर्निहित कारकों पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। केवल फंडिंग के चक्कर में इस प्रकार की अनियमितता नहीं होनी चाहिए, बल्कि पारदर्शिता और उत्तरदायित्व भी सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है।