राजस्थान के अजमेर जिले के श्रीनगर से आई एक पिता की कहानी ने सभी का दिल छू लिया है। उनके 3 साल के बेटे को, जो पहले चल नहीं पाता था, अब जयपुर में किए गए इलाज के बाद थोड़ी राहत मिली है। पिता का कहना है कि उन्होंने कई जगहों पर अपने बेटे का इलाज कराया, लेकिन कोई परिणाम नहीं मिला। अंततः जब उन्होंने जयपुर के एक जेनेटिक डिसऑर्डर विशेषज्ञ से संपर्क किया और कुछ आवश्यक परीक्षण किए, तो पता चला कि उनके बेटे को आनुवंशिक विकार है। अब, दवाओं के प्रभाव से बच्चे की स्थिति में सुधार हो रहा है; वह अब चलने और कुछ बोलने लगा है। यह केवल एक पिता की कहानी नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि समय पर सही उपचार और पहचान कितनी महत्वपूर्ण है। प्रदेश भर में ऐसे कई मरीज मौजूद हैं, जिन्हें सही समय पर इलाज न मिल पाने के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
राज्य सरकार अच्छी खबर लेकर आई है कि वह प्रदेश में पहला डिपार्टमेंट ऑफ मेडिकल जेनेटिक्स स्थापित करने जा रही है। यह नया विभाग जयपुर के जेके लोन हॉस्पिटल में खोला जाएगा। इस डिपार्टमेंट के साथ 40 बेड का आवंटन किया गया है, जिसमें नवनिर्मित भवन, पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी वार्ड, एनआईसीयू और पीआईसीयू वार्ड शामिल हैं। इस संबंध में 12 विभिन्न पदों की स्वीकृति भी दी गई है, जिसमें प्रोफेसर से लेकर मेडिकल ऑफिसर तक शामिल हैं। यह विभाग विभिन्न प्रकार की आनुवंशिक बीमारियों के इलाज और पहचान में मदद करेगा।
सम्भवतः इस नई योजना का उद्घाटन राजस्थान दिवस पर 30 मार्च को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किया जाएगा। इस डिपार्टमेंट की स्थापना के साथ ही रोगियों को ओपीडी और आईपीडी सुविधाओं के नए विकल्प मिलेंगे, साथ ही उन्हें जेनेटिक काउंसलिंग का भी लाभ मिलेगा। अद्भुत बात यह है कि इस विभाग की कार्यप्रणाली में भ्रूण की जांच की सुविधाएं शामिल की जाएंगी, जिससे गर्भवती महिलाएं अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के अनुवांशिक स्वास्थ्य का पता लगा सकेंगी। यदि किसी भी प्रकार की आनुवांशिक बीमारी पाई जाती है, तो परिवार उचित निर्णय ले सकेगा।
आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर लगभग सात से आठ हजार जेनेटिक डिसऑर्डर ज्ञात हैं, जिनमें से केवल 450 ही इलाज योग्य हैं। भारत में, 63 ऐसे विकारों का उपचार सरकारी स्तर पर मान्य किया गया है, जैसे सिकल सेल एनीमिया, ऑटिज्म और अन्य। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में हर साल जन्म लेने वाले 15 लाख बच्चों में से 2 से 5 प्रतिशत बच्चों में आनुवंशिक बीमारी होने की संभावना होती है। अक्सर माता-पिता इन बीमारियों को समय पर पहचान नहीं पाते हैं, जिसके कारण या तो बच्चे की मृत्यु होती है या फिर वह दिव्यांगता का सामना करते हैं। उम्मीद है कि नए डिपार्टमेंट की स्थापना से इस प्रकार की समस्याओं में कमी आएगी और जरूरतमंद परिवारों को सही सलाह व उपचार मिल पाएगा।