बिहार के विधानसभा चुनाव 2023 के संदर्भ में समाजवादी पार्टी (सपा) ने राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का समर्थन करने का निर्णय लिया है। सपा के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस फैसले को न केवल अपने समर्पित नेताओं तक पहुंचाया है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया है कि सपा का उद्देश्य भाजपा को हराना है। इस बीच, सपा का यह कदम कांग्रेस के साथ उसके संबंधों में और तनाव बढ़ा सकता है, क्योंकि कांग्रेस खुद को मजबूत करने के लिए अपनी चुनावी रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। पहले दिल्ली में सपा ने कांग्रेस का साथ छोड़कर केजरीवाल की पार्टी का समर्थन किया था और अब बिहार में आरजेडी का समर्थन करते हुए कांग्रेस को चुनौती दी है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि सपा और कांग्रेस के मध्य उत्तर प्रदेश में चल रहे गठबंधन पर भी संशय के बादल मंडरा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर जोर दे रहे हैं कि अखिलेश यादव का यह कदम अपने आप में कई रणनीतिक लक्ष्यों को दर्शाता है। यादव का मानना है कि जो राजनीतिक पार्टी भाजपा को हराने में सक्षम होगी, सपा उसका सहयोग करेगी। इसी सोच के तहत, उन्होंने आरजेडी को समर्थन दिया है ताकि बिहार में विपक्ष के वोटों का विभाजन न हो सके और भाजपा को चुनौती दी जा सके। बिहार में सपा का जनाधार सीमित है, और इसीलिए उनकी नजरें तेजस्वी यादव की आरजेडी पर टिकी हुई हैं, जिससे वहां सपा का अप्रत्यक्ष प्रभाव बढ़ सके।
कांग्रेस के नेताओं द्वारा बार-बार यह दावा किया जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में उन्हें सपा के समान बराबरी का हिस्सा चाहिए। ऐसे में सपा का राजनैतिक दृष्टिकोण यह दर्शाने के लिए है कि वह कांग्रेस पर निर्भर नहीं है। राजेंद्र कुमार जैसे वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि अखिलेश यादव का ऐसा कदम साफ दर्शाता है कि वह भाजपा के खिलाफ विपक्षी वोट को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं। अगर कांग्रेस आरजेडी से अलग होकर चुनाव लड़ती है, तो यह निश्चित रूप से सपा और कांग्रेस के बीच के रिश्तों में और खटास पैदा कर सकता है। इस तरह की स्थिति आने पर सपा और कांग्रेस का तालमेल और कमजोर होने की संभावना है।
सपा प्रवक्ता अमीक जामेई इस संबंध में बताते हैं कि सपा का असली मुकाबला भाजपा से है और जहां-जहां भाजपा को हराने वाले दल मजबूत होंगे, सपा उनकी मदद करेगी। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी को चुनावी लड़ाई में आगे बढ़ने का समर्थन देकर, सपा विपक्षी एकता को मजबूती प्रदान कर सकती है। वहीं, कांग्रेस का कहना है कि उनके शीर्ष नेताओं के बीच गठबंधन के खिलाफ कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। इस प्रकार, आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरणों की पेचीदगियों से स्पष्ट होता है कि सपा का कदम कांग्रेस और आरजेडी दोनों के लिए बड़ा संकेत है, जो आगामी चुनावी लड़ाई को प्रभावित कर सकता है।
अंत में, सपा-कांग्रेस के बीच बढ़ते विवाद और आरजेडी के समर्थन के पीछे की रणनीति का एकमात्र उद्देश्य भाजपा को कमजोर करना है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह सहयोग बिहार में विपक्षी गठबंधन को मजबूत करने में सफल होगा, या फिर इससे सपा और कांग्रेस के बीच और खटास बढ़ेगी।