महाशिवरात्रि पर जानें: शिव-पार्वती का रहस्य और सृष्टि का रचना सूत्र!

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शिव तत्व का महत्व और पार्वती तत्व का रहस्य

शैव दर्शन के अनुसार, इस सृष्टि में 36 तत्वों की एक श्रृंखला है, जिसमें पहला तत्व पृथ्वी है और अंतिम तत्व शिव। शिव तत्व को चेतना का सबसे सूक्ष्म रूप माना जाता है, जो संपूर्ण सृष्टि के मूल में विद्यमान है। यह तत्व ही वह मूल आधार है, जिससे सृष्टि का आरंभ होता है और अंत में सब कुछ इसमें समाहित हो जाता है। इसी वजह से शिव तत्व को सृष्टि का सार कहा जाता है। यह तत्व न केवल स्थिरता का प्रतीक है, बल्कि यह समस्त ब्रह्मांडीय अस्तित्व का वास्तविक रूप है।

जब हम पार्वती तत्व की बात करते हैं, तो यह तत्व ज्ञान, गतिशीलता और स्पंदन का प्रतीक है। शिवसूत्रों में उल्लेखित एक सूत्र ‘इच्छाशक्ति: उमा कुमारी’ से स्पष्ट होता है कि पार्वती तत्व की मूल प्रवृत्ति शक्ति की है। इसी प्रकार शिव शांति का प्रतीक है। महाशिवरात्रि के दिन शिव और पार्वती का विवाह एक गूढ़ कथा का रूप है, जिसमें दो तत्वों का मिलन दर्शाया गया है। यह मिलन दर्शाता है कि आत्मा और उसकी ऊर्जा के बीच की संबंध का ताजा रूप है। शिव और शक्ति का यह वैवाहिक बंधन, जो हमारे अंदर भी घटित होता है, अनंत काल से चलता आ रहा है।

महाशिवरात्रि का पावन पर्व हमें तीन महत्वपूर्ण पहलुओं—ध्यान, उपवास और प्रार्थना—की ओर इंगित करता है, जो हमें शिव तत्व से जोड़ते हैं। पहला, ध्यान। महाशिवरात्रि के दिन विशेष ध्यान के लिए सूर्योदय और सूर्यास्त के समय को सर्वोत्तम माना जाता है। यह समय वसंत के आगमन का प्रतीक है जब ध्यान ग्रहण करना विशेष रूप से फायदेमंद साबित होता है। ऐसे में मनोकामनाएं पूरी होने का भी विश्वास है। दूसरा, उपवास। जब हम परमात्मा पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो उपवास हमें बोझिल नहीं लगता। उपवास हमारे शरीर को विषाक्त पदार्थों से मुक्त करता है और मन को आध्यात्मिक गतिविधियों में लगाए रखता है। इससे ध्यान में वृद्धि होती है और मस्तिष्क अधिक केंद्रित रहता है।

तीसरा, प्रार्थना। यह शरीर और आत्मा को मजबूत बनाने का कार्य करती है। महाशिवरात्रि के अवसर पर महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जा सकता है। इसका अर्थ है कि हम शिव से जुड़ना चाहते हैं, जो भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने वाले हैं। प्रार्थना से न केवल हमारी आत्मा की शक्ति बढ़ती है, बल्कि यह हमें बंधनों से अवमुक्त भी करती है। इस प्रकार, महाशिवरात्रि का दिन हमें ध्यान, उपवास और प्रार्थना के माध्यम से शिव तत्व से जुड़ने का अद्भुत अवसर प्रदान करता है, जो हमें जीवन में स्थिरता और दिव्यता की ओर ले जाता है।